(hindi) VIRODHI
“लोग कहते हैं अंग्रेजी पढ़ना और भाड़ झोंकना एक बराबर है। अंग्रेजी पढ़ने वालों की हालत खराब है। अच्छे-अच्छे एम.ए. और बी.ए. मारे-मारे फिरते हैं, कोई उन्हें पूछता तक नहीं। मैं इन बातों के खिलाफ़ हूं। अंग्रेजी पढ़-लिखकर मैं डॉक्टर बना हूं। अंग्रेजी शिक्षा का विरोध करने वाले ज़रा आंख खोलकर मेरी हालत देखें।
सोमवार का दिन था। सवा नौ बजे मेरे दोस्त बाबू सन्तोष कुमार बी.एस-सी. एक नौजवान रोगी को साथ लिये मेरे दवाखाने में आये। उस रोगी की उम्र अठारह-उन्नीस से ज़्यादा न थी। गेहुआं रंग, बड़ी-बड़ी आंखें, हट्टा-कट्टा शरीर, कपड़े स्वदेशी, लेकिन मैले थे। सिर के बाल लम्बे और रूखे। उस लड़के को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई।
सन्तोष कुमार ने नौजवान से मिलाते हुए कहा- “”ये जिला नदिया के रहने वाले हैं, नाम ललित कृष्ण बोस है, लेकिन ललित के नाम से जाने जाते हैं। एम.ए. में पढ़ते थे; पर किसी कारण से कॉलेज छोड़ दिया।””
मैंने मुस्कराते हुए पूछा- “”आजकल आप क्या करते हैं?””
सन्तोष कुमार ने जवाब दिया- “”दो महीने पहले यह किरण प्रेस में प्रूफरीडर के तौर पर काम कर रहा था लेकिन इस काम में मन न लगने के कारण नौकरी छोड़ दी। परसों से बुख़ार है, कोई अच्छी दवा दीज़िए।””
आज से पहले भी मैंने इस लड़के को कहीं देखा है, पर कहां देखा है और कब, यह याद नहीं। बीमारी की छान-बीन के बाद मैंने ललित से कहा- “”लगता है, आप ज़रुरत से ज़्यादा मेहनत करते हैं, खैर, कोई बात नहीं दो दिन में आराम हो जायेगा।””
ललित बहुत मीठा बोलता था। मैं उसकी बातों पर लट्टू हो गया। मैंने कहा- “”हर तीन घण्टे के अन्तर से दवा पीजियेगा। दूध और साबूदाने के सिवाय कोई और चीज खाने की ज़रुरत नहीं। कल फिर आने का कष्ट कीजियेगा।””
ललित हंसने लगा। जाते समय मैंने उससे कल ज़रूर आने के लिए कहा, पर ललित ने शाम को ही आने का वादा किया ।
ललित हर रोज़ सुबह-शाम मेरे यहां आने लगा। मैं उसके व्यवहार से बहुत ख़ुश था। हमारे बीच घंटों इधर-उधर की बातें होती थी। ललित सच में ललित था, कुशल और अच्छा। वह इंसान नहीं देवता था।
ललित अब मेरे घर पर ही रहने लगा। मेरा लड़का उमाशंकर आठवीं क्लास में पढ़ता था। ललित ने कहा- “”मैं इसे बंगला सिखाऊंगा, बंगला बड़ी मीठी भाषा है।”” मैं ख़ुद भी यही चाहता था। उमाशंकर ने बंगला पढ़ना शुरू कर दिया, ललित आज से उमाशंकर का टीचर बन गया।
कलकत्ता जैसे बड़े शहर में यूं तो हर त्यौहार पर बड़ी रौनक होती है लेकिन दुर्गा-पूजा के मौके पर कमाल की धूमधाम और चहल-पहल दिखाई देती है। दशहरा के दिन अक्सर रास्तों पर लोगों का सैलाब सा होता है। बड़े-बूढ़ों में भी उस दिन एक ख़ास ख़ुशी की भावना होती है, लड़कों और नौजवानों की तो क्या कहने। हर आदमी अपनी धुन में मस्त दिखाई देता है। जिस समय दुर्गा की सवारी सामने से आती है तो 'काली माई की जय' की आवाज से आकाश गूंज उठता है, दिल में एक अनोखी उमंग पैदा हो जाती है।
उस दिन दुर्गा पूजा थी। हम सब भी पूजा देखने गये थे, ललित भी हमारे साथ था। पहले की तुलना में ललित में आज ज़्यादा जोश था। हर जगह पर वह देवी की मूर्ति को प्रणाम करता, कभी उसकी आँखें लाल हो जाती और कभी उनमें आंसू उमड़ आते। मैंने देखा, कभी वह ख़ुशी से नाचने-कूदने लगता और कभी बिलकुल चुपचाप हक्का-बक्का होकर इधर-उधर देखता। मैंने बहुत कोशिश की ; लेकिन उसकी इन हरकतों को समझ न सका। उससे पूछने की हिम्मत भी न हुई।
हमारे पीछे एक गरीब बुढ़िया आठ-नौ साल के एक बच्चे को साथ लिये खम्भे की आड़ में खड़ी थी। शायद बहुत भीड़ होने के कारण वो आगे जाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी । वह भिखारिन थी। गरीबी के कारण उसका पेट पीठ से चिपक गया था। उसने अपना दाहिना हाथ भीख के लिए फ़ैला रखा था। बच्चा विनती करते हुए कह रहा था- “”बाबा, भूखे की सुध लेना, भगवान् तुम्हारा भला करेगा।”” लेकिन संसार में गरीबों की कौन सुनता है? गरीब बुढ़िया की ओर किसी ने आंख उठाकर भी न देखा, हर आदमी अपनी ख़ुशी में मगन था। बच्चे ने बुढ़िया से कहा- “”घंटों बीत गए लेकिन अब तक दो पैसे मिले हैं, सोचता था आज दुर्गा-पूजा है कुछ ज़्यादा ही मिल जायेगा; पर दुःख है कि चिल्लाते-चिल्लाते गला बैठ गया; कोई सुनता ही नहीं। जी में आता है यहीं जान दे दूं।”” यह कहकर बच्चा रोने लगा।
बुढ़िया की आंखों में आंसू झलकने लगे। उसने कहा, “”बेटा! अपना भाग्य ही खोटा है, कल सत्तू खाने के लिए छ: पैसे मिल गये थे आज उसका भी सहारा दिखाई नहीं देता। आज भूखे पेट ही रहना होगा। हाय! यह हमारे पाप का फल है।””
बुढ़िया ने एक ठंडी सांस ली और अपने फटे मैले आंचल से अपनी और बच्चे की आंखें पोंछीं। बच्चा फिर उसी विनती से कहने लगा- 'बाबा, भूखे की सुध लेना, भगवान् तुम्हारा भला करेगा।' हज़ारों लोग जमा थे ; पर इस विनती की पुकार कोई सुनने वाला न था।
ललित उस समय बुढ़िया की ओर देख रहा था। उसकी दुखदायी दशा देखकर उसका दिल बेचैन हो गया। उसने अपनी जेब टटोली, उसमें एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उसने अपनी दूसरी जेब में हाथ डाला, कुछ ज़रूरी कागजों के बीच में एक अठन्नी निकल आई। ललित की निराशा ख़ुशी में बदल गई, उसका चेहरा खिल गया। उसने अठन्नी बुढ़िया के हाथ पर रख दिया ।
जिस तरह दस-पांच रुपये लगाने वाले को लॉटरी में दस-बीस हजार रुपये मिल जाने पर ख़ुशी होती है, जिस तरह एक औरत नए गहने पहनकर ख़ुश होती है, जिस तरह सूखे हुए खेत में बारिश हो जाने से किसान ख़ुशी से फूला नहीं समाता, जिस तरह कोई नया कवि अपनी कविता को किसी किताब में छपा हुआ देखकर ख़ुश होता है, उससे कहीं ज़्यादा उस गरीब बुढ़िया को अठन्नी पाकर ख़ुशी हुई थी । ख़ुशी के मारे उसकी आंखों में आंसू भर आए, वह एक टक ललित की ओर देखने लगी। उसका मग्न मन ललित को हज़ारों आशीर्वाद दे रहा था।
यह देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैंने कई बार उस बुढ़िया को देखा था, उससे मुझे हमदर्दी भी थी लेकिन कभी यह हिम्मत न हुई कि उसकी मदद करूं। कभी दिल में आता कि उसे कुछ देना चाहिए, कभी यह कहता कि इसमें क्या रखा है, संसार में लाखों गरीब हैं किस-किसकी मदद करूंगा? ललित, जिसे कभी-कभी ख़ुद भूखे तक रहना पड़ता, जिसे मैंने कभी एक पैसे का पान चबाते न देखा था और जो मेरी नज़र में बहुत कंजूस था, उसका यह दान देखकर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही।
सपने में उस दिन मुझे ललित की कई ख़ूबियाँ दिखाई दीं। मालूम नहीं वो सच था या झूठ , लेकिन ज्योतिषी के हिसाब से उन्हें सच ही समझना चाहिए। इसका कारण यह है कि मुझे रात ढाई बजे नींद आई और वह सपना मैंने रात के अंतिम पहर में देखा था।
Puri Kahaani Sune…
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