(hindi) Aakhiri Heela

(hindi) Aakhiri Heela

“हालाँकि मेरी याददाश्त  धरती के इतिहास की सारी याद रखने लायक तारीखें भूल गयीं, वह तारीखें जिन्हें रातों को जागकर और दिमाग को परेशान कर याद किया था, मगर शादी की तारीख समतल जमीन में एक खम्बे की तरह पक्की है। न भूलता हूँ, न भूल सकता हूँ। उससे पहले और पीछे की सारी घटनाएँ दिल में मिट गयीं, उनका निशान तक बाकी नहीं। वह सारी अलग बाते अब एक हो गयी है और वह मेरी शादी की तारीख है। चाहता हूँ, उसे भूल जाऊँ, मगर जिस तारीख को रोज याद किया जाता हो, वह कैसे भूला जाय, रोज याद क्यों करता हूँ, यह उस मुसीबत से पूछिए जिसे भगवान के भजन के सिवा जीवन के उद्धार का कोई सहारा न रहा हो।

लेकिन क्या मैं शादीशुदा जीवन से इसलिए भागता हूँ कि मुझमें हँसी मज़ाक करने की आदत नहीं है और मैं नाजुक से मन को मोहने वाली के  मोह से दूर हो गया हूँ और मेरा हर मोह माया से नाता टूट चुका है। क्या मैं नहीं चाहता कि जब मैं सैर करने निकलूँ, तो दिल में बसने वाली पत्नी भी मेरे साथ हों। ऐय्याशी की चीज़ो की दुकानों पर उनके साथ जाकर थोड़ी देर के लिए उन चीज़ो के लिए उसकी जिद देखने  की ख़ुशी मिले। मैं उस गर्व और ख़ुशी और जरुरत को महसूस कर सकता हूँ, जो मेरे और भाइयों की तरह मेरे दिल में भी जिंदा होगा, लेकिन मेरे भाग्य में वह खुशियाँ वह मौज-मस्ति नहीं हैं।

क्योंकि चित्र का दूसरा पहलू भी तो देखता हूँ। एक पक्ष जितना ही मन को लुभाने वाला और खींचने वाला है, दूसरा उतना ही दिल दुखने वाला  और डरावना। शाम हुई और आप बदनसीब बच्चे को गोद में लिये तेल या ईंधन की दुकान पर खड़े हैं। अंधेरा हुआ और आप आटे की पोटली बगल में दबाये गलियों में ऐसे कदम बढ़ाये हुए निकल जाते हैं, मानो चोरी की है। सूरज निकला और बच्चों को गोद में लिये होमियोपैथ डाक्टर की दुकान में टूटी कुर्सी पर बैठे हैं। किसी खोंमचे वाले की मीठी आवाज सुनकर बच्चे ने आसमान चीरने वाला रोना शुरू किया और आपकी जान निकली। ऐसे बापों को भी देखा है, जो दफ्तर से लौटते हुए पैसे-दो पैसे की मूँगफली या रेवड़ियाँ लेकर शर्म के साथ जल्दी से इसलिए खा जाते है कि घर पहुँचते-पहुँचते बच्चों के हमला करना से पहले ही वो ख़त्म हो जाय। कितना निराश करता है यह नज़ारा, जब देखता हूँ कि मेले में बच्चा किसी खिलौने की दुकान के सामने जिद कर रहा है और पिता महोदय ऋषियों की तरह “” थोड़ी देर की जिद है”” का राग अलाप रहे हैं।

चित्र का पहला रुख तो मेरे लिए कामदेव का सपना है, दूसरा रुख एक कड़वा सच। इस सच के सामने मेरी सारी हँसी मज़ाक करने की आदत  गायब हो जाती है। मेरे सारे उसूल, बुनियाद और कल्पना इसी शादी के फंदों से बचने में इस्तेमाल हुई है। जानता हूँ कि जाल के नीचे जाना है, मगर जाल जितना ही रंगीन और मोल लेने वाला है, दाना उतना ही दुःख देने वाला और जहरीला। इस जाल में पक्षियों को तड़पते और फड़फड़ाते देखता हूँ, और फिर भी जाल पर जा बैठता हूँ।

लेकिन इधर कुछ दिनों से श्रीमतीजी ने बिना चैन लिए जिद करना शुरू किया कि मुझे बुला लो। पहले जब छुट्टियों में जाता था, तो मेरा सिर्फ़ 'कहाँ चलोगी' कह देना मन की शांति के लिए बहुत होता था, फिर मैंने 'झंझट है' कहकर उन्हें तसल्ली देनी शुरू की। इसके बाद घर-परिवार  की मुश्किलों से डराया, पर अब कुछ दिनों से उनकी शंका बढ़ती जा रही है। अब मैंने छुट्टियों में भी उनकी जिद के डर से घर जाना बंद कर दिया है कि कहीं वह मेरे साथ न चल खड़ी हों और अलग-अलग बहानों से उन्हें डरता रहता हूँ।

Puri Kahaani Sune..

(hindi) Kabulivala

(hindi) Kabulivala

“मेरी पाँच साल की छोटी लड़की मिनी से पल भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में आने के बाद बोलने में उसने सिर्फ एक ही साल  लगाया होगा। उसके बाद से जब तक जगी रहती है उसका का एक पल भी वह चुप रहकर नहीं बिताती। उसकी माँ अक्सर डाँट-फटकार कर उसकी चलती हुई जुबान बंद कर देती है; लेकिन मुझसे ऐसा नहीं होता। मिनी की चुप्पी मुझे इतनी अस्वाभाविक लगती है, कि मुझसे वह ज़्यादा देर तक सहा नहीं जाता और यही कारण है कि मेरे साथ उसकी भावनाओं का लेन-देन कुछ ज़्यादा जोश के साथ होता रहता है।

सवेरे मैंने अपने उपन्यास के सत्तरहवें चैप्टर में हाथ लगाया ही था कि इतने में मिनी ने आकर कहना शुरू कर दिया, “”बाबा! रामदयाल दरबान कल ‘काक’ को कौआ कहता था। वह कुछ भी नहीं जानता, है न बाबा ?””

दुनिया की एकाग-अलग भाषाओं के बारे में मेरे कुछ बताने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी, “”बाबा! भोला कहता था आकाश मुँह से पानी फेंकता है, इसी से बारिश होती है। अच्छा बाबा, भोला झूठ-मूठ कहता है न? खाली बक-बक किया करता है, दिन-रात बकता रहता है।””

इस बारे में मेरी राय की ज़रा भी राह न देख कर, चट से धीमे आवाज़ में एक मुश्किल सवाल कर बैठी, “बाबूजी, माँ तुम्हारी कौन लगती है?””
उसके इस सवाल का जवाब देना, किसी भंवर में फंसने के बराबर था इसलिए मैंने उसका ध्यान हटाने के लिए कहा, “”मिनी, तू जा, भोला के साथ खेल, मुझे अभी काम है, अच्छा।””

तब उसने मेरी मेज के पास पैरों के पास बैठकर अपने दोनों घुटने और हाथों को हिला-हिलाकर बड़ी जल्दी-जल्दी से मुंह चलाकर ‘अटकन-बटकन दही चटाके’ कहना शुरू कर दिया। जबकि मेरे उपन्यास के चैप्टर में प्रतापसिंह उस समय कंचनमाला को लेकर रात के गहरे अँधेरे में जेल  के ऊंचे झरोखे से नीचे कलकल करती हुई नदी में कूद रहा था।

मेरा घर सड़क के किनारे पर था, अचानक मिनी अपने अटकन-बटकन को छोड़कर कमरे की खिड़की के पास दौड़ गई, और जोर-जोर से चिल्लाने लगी, “”काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला””…

मैले-कुचैले ढीले कपड़े पहने, सिर पर साफा बाँधे, कंधे पर सूखे फलों की मैली झोली लटकाए, हाथ में अंगूरों की कुछ पिटारियाँ लिए, एक लम्बा-तगड़ा-सा काबुली धीमी सी चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देखकर मेरी छोटी बेटी के दिल में कैसे भाव पैदा हुए यह बताना मुश्किल है। उसने जोरों से पुकारना शुरू किया। मैंने सोचा, अभी झोली कंधे पर डाले, सर पर एक मुसीबत आ खड़ी होगी और मेरा सत्तहरवा चैप्टर आज अधूरा रह जाएगा।

लेकिन मिनी के चिल्लाने पर जैसे ही काबुली ने हँसते हुए उसकी ओर मुँह फेरा और घर की ओर बढ़ने लगा; वैसे ही मिनी डर के मारे अंदर भाग गई। फिर उसका पता ही नहीं लगा कि कहाँ छिप गई। उसके छोटे-से मन में वह अन्धविश्वास बैठ गया था कि उस मैली-कुचैली झोली के अन्दर ढूँढ़ने पर उस जैसी और भी जीती-जागती बच्चियाँ निकल सकती हैं।

इधर काबुली ने आकर मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने सोचा, सच में प्रतापसिंह और कंचनमाला गंभीर मुसीबत में है, फिर भी घर में बुलाकर इससे कुछ न खरीदना अच्छा न होगा।

कुछ सामान खरीदा गया। उसके बाद मैं उससे इधर-उधर की बातें करने लगा। खुद रहमत, रूस, अंग्रेज, सीमान्त रक्षा के बारे में गप-शप होने लगी।

आखिर में उठकर जाते हुए उसने अपनी मिली-जुली भाषा में पूछा, “”बाबूजी, आपकी बच्ची कहाँ गई?””

मैंने मिनी के मन से बेकार के डर को दूर करने के लिए उसे अंदर से बुलवा लिया। वह मुझसे बिल्कुल सटकर काबुली के चेहरे और झोली की ओर शक से देखती खड़ी रही। काबुली ने झोली में से किसमिस और खुबानी निकालकर देना चाहा, पर उसने नहीं लिया और दुगुने शक के साथ मेरे घुटनों से लिपट गई। काबुली वाले से उसकी पहली मुलाक़ात इस तरह हुई ।

Puri Kahaani Sune..

(hindi) The Adventure of the Three Students

(hindi) The Adventure of the Three Students

“यह साल 95 की बात है, उस समय कुछ कारणों के चलते, जिन्हें यहाँ बताने की जरुरत नहीं है, मुझे और मिस्टर शरलॉक होम्स को अपने शहर की महान यूनिवर्सिटी में रहना पड़ा, उस समय हमारे सामने एक छोटी मगर अजीब घटना हुई, जिसे मैं बताने जा रहा हूँ। यह जाहिर है कि इस घटना की कोई भी ऐसी जानकारी जो इसे पढ़ने वालों को कॉलेज या अपराधी की एकदम सही पहचान करा सकती है, को बताना नासमझी और गलती होगी।

इतनी दर्दनाक घटना को खामोशी के साथ दबे रहने देना चाहिए। हालांकि, कुछ सावधानियां बरतते हुए इस घटना को बताया जा सकता है, क्योंकि यह मेरे दोस्त के बेहतरीन, बताने लायक हुनर और गुणों को दिखाती है। मैं इस घटना की उन चीज़ों को बताने से बचूँगा जिससे कि घटना की बिलकुल सही जगहों या उससे जुड़े लोगों की जानकारी मिल सके।    
  
बात उन दिनों की है जब हम लाइब्रेरी के पास एक आलिशान लॉज में रह रहे थे, जहाँ शरलॉक शुरूआती अंग्रेजी चार्टर की कुछ मुश्किल रिसर्च-जिनके नतीजे आने पर, वो मेरी आने वाली कहानियों का सब्जेक्ट हो सकता है, पर काम कर रहा था। एक दिन शाम को मिस्टर  हिलटन सोम्स नाम का आदमी मिलने आया, जिसे हम जानते थे, और जो कॉलेज ऑफ़ सेंट ल्यूक्स का प्रोफेसर था। मिस्टर  सोम्स एक लम्बा चौड़ा नर्वस किस्म का, जल्दी जोश में आ जाने वाला शख्स था। मैंने उसे हमेशा बेचैन ही देखा था, लेकिन इस बार वह ज्यादा ही परेशान था और मुझे वह अपने कंट्रोल में नहीं लग रहा था, साफ था कि कोई मामूली बात नहीं थी, जरूर कोई बहुत बड़ी बात हुई थी। 

“मुझे यकीन है मिस्टर होम्स कि आप मुझे अपने कीमती समय में से कुछ समय देंगे। हमारे कॉलेज सेंट ल्यूक्स में एक बहुत ही दुःखद घटना घट गयी है, और सच में, ये तो अच्छा हुआ कि आप इस समय इसी शहर में हैं, वरना मुझे नहीं पता मैं क्या करता।” 

“अभी तो मैं बहुत ही बिजी हूँ और मैं नहीं चाहता कि मेरा ध्यान कहीं और जाए।” मेरे दोस्त ने जवाब दिया। “मैं चाहता हूँ आप मेरे बजाय पुलिस की मदद लें।”

“नहीं, नहीं सर; ऐसा करना तो बिलकुल नामुमकिन है। अगर एक बार कानून की मदद ले ली तो फिर इस खबर को फैलने से नहीं रोका जा सकता और यह उन मामलों में से एक है जहाँ, कॉलेज की इज़्ज़त बचाने के लिये इस घटना को दबाना बहुत जरूरी है। आपके हुनर और ताकत के बारे में सब जानते है, पूरी दुनियाँ में बस एक आप ही हैं जो मेरी मदद कर सकते है। मैं आपसे विनती करता हूँ, मिस्टर होम्स, आप जो भी कर सकते हैं करें।” 

पर मेरे दोस्त को अब भी कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि वह अपनी बेकर स्ट्रीट वाली जानी-पहचानी जगह से दूर था। जहाँ पर ना उसकी नोटबुक और ना ही उसके केमिकल थे, और अपने घर पर नहीं होने की वजह से वह कुछ परेशान था। उसने लाचारी के साथ अपने कंधे हिला दिए, जबकि हमसे मिलने आया हुआ आदमी उत्तेजित हालत में जल्दी-जल्दी बोलता हुआ अपनी कहानी सुनाने लगा।

“मैं आपको पूरी कहानी बताता हूँ, मिस्टर होम्स, कल हमारे यहाँ फोर्टेसक्यू स्कॉलरसिप (Fortescue Scholarship) एग्जाम का पहला दिन है। मैं वहाँ पर एक एक्जामिनर हूँ, मेरा सब्जेक्ट ग्रीक है, और पहले पेपर में ग्रीक ट्रांसलेशन का एक बड़ा सा पैसेज है जो कि कैंडिडेट ने नहीं देखा है। यह पैसेज एग्जाम पेपर पर छपा है, और अगर यह पेपर किसी स्टूडेंट को पहले ही मिल जाये तो उसे इसकी तैयारी करने में आसानी होगी और उसे इसका फायदा होगा। इसलिए एग्जाम पेपर को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम उठाये गए हैं”।
   
“आज लगभग तीन बजे पेपर के प्रूफ्स प्रिंटर से आये हैं। इसमें थ्यूसिसडीज़ (Thucydides) का आधा chapter होता है। मुझे इसे बड़ी सावधानी पड़ना था ताकि कहीं भी कोई गलती ना हो और लिखा हुआ एकदम ठीक छपा हो। साढ़े चार बजे, मेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ था। लेकिन इस समय मैंने अपने दोस्त को उसके कमरे पर चाय पीने का वादा किया था, इसलिए मैं प्रूफ को टेबल पर छोड़कर चला गया। मुझे वहाँ लगभग एक घंटे से भी ज्यादा समय लगा”।

“आप तो जानते ही हैं मिस्टर  होम्स, कि हमारे कॉलेज में दो दरवाजे लगे हैं, अंदर की तरफ हरे बेज़ का और बाहर की तरफ भारी ओक का दरवाजा लगा है। जैसे ही मैं वापस लौटकर बाहर के दरवाज़े पर पहुँचा तो उस पर चाबी लटकी हुई देखकर चौंक गया। एक पल के लिए मुझे लगा कि मैं चाबी यहीं भूल गया था, लेकिन जब मैंने अपनी जेब में देखा तो चाबी वहीं थी। 

जहाँ तक मुझे पता है, दूसरी चाबी मेरे नौकर बैनिस्टर के पास रहती है, जो पिछले दस सालों से यहाँ की देखरेख कर रहा है, वह बहुत भरोसे का आदमी है, उसकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता, और मुझे मालूम हो चुका था कि चाबी उसी की है क्योंकि वह मेरे कमरे में चाय पूछने आया था और बाहर जाते समय लापरवाही से चाबी वहीं दरवाज़े पर छोड़कर चला गया। जरूर मेरे जाने के कुछ ही मिनटों के बाद वह मेरे कमरे में आया होगा। किसी और मौके पर उसकी यह लापरवाही छोटी-सी भूल मानी जा सकती थी, पर आज के दिन इसके परिणाम बहुत बुरे हो सकते हैं”। 

“जब मैंने अपनी मेज पर देखा तो मुझे पता लग गया कि किसी ने मेरे पेपरों के साथ छेड़छाड़ की है। इसका सबूत वो तीन पेपर्स थे। जिन्हें मैं एक साथ रखकर छोड़ गया था। पर, अब वह बिखरे हुए थे, उनमें से एक नीचे फर्श पर पड़ा था, और दूसरा खिड़की के पास कोने की टेबल पर, और तीसरा वहीं पर था जहाँ मैं छोड़कर गया था।”

होम्स ने पहली बार कुछ हलचल की।
“पहला पेज फर्श पर, दूसरा खिड़की पर और तीसरा जहाँ तुम उसे छोड़ गए थे,” उसने कहा। 
“बिलकुल सही, मिस्टर होम्स। आपने तो मुझे हैरान कर दिया। आपने यह कैसे जान लिया?”
“आप अपनी दिलचस्प कहानी जारी रखिये।”

“एक पल के लिए तो मैंने सोचा कि बैनिस्टर ने मेरे पपरों से छेड़छाड़ करने की हिमाकत की है। लेकिन उसने इस इल्ज़ाम से साफ इनकार कर दिया, और मुझे भी भरोसा हो गया कि वह सच बोल रहा है। दूसरा यह भी हो सकता है कि किसी ने उधर से गुजरते हुए दरवाजे पर चाबी लटकती हुई देख ली थी, और वह जान गया कि मैं बाहर गया हुआ हूँ, और पेपर देखने अंदर चला गया हो। यह स्कॉलरशिप बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बहुत बड़ी रकम दांव पर लगी हुई है, और इसलिए कोई भी बेईमान आदमी अपने साथी से आगे लाने के लिए ऐसा खतरा मोल ले सकता है”।

“बेनिस्टर इस घटना से बहुत ज्यादा परेशान हो गया था। वह लगभग बेहोश-सा हो गया था जब हमे यह पता चला की पपेरों से छेड़छाड़ की गयी है। मैंने उसे थोड़ी -सी ब्रांडी दी और एक चेयर पर पड़े रहने दिया। उसके बाद मैंने बहुत ध्यान से कमरे का जायज़ा लिया। जल्दी ही मैंने देखा कि घुसपैठिये ने बिखरे हुए पपेरों के पास अपने वहां होने के और भी निशान छोड़े हैं।

खिड़की के पास वाली टेबल पर पेन्सिल को तेज करने की कोशिश की गयी थी, क्योंकि वहाँ पेंसिल के छिलके पड़े हुए थे, लीड का एक टूटा हुआ टुकड़ा भी वहाँ पड़ा हुआ था। साफ जाहिर था कि उस बदमाश ने जल्दी-जल्दी में पेपर की नकल करने की कोशिश की और उसकी पेन्सिल की नोक टूट गयी, इसलिए उसे फिर से पेन्सिल को छिलने के लिए मजबूर होना पड़ा।” 

“बहुत खूब!” होम्स ने कहा, जैसे-जैसे उसकी दिलचस्पी इस केस में बढ़ती गयी, वैसे-वैसे उसका खोया हुआ जोश भी वापस आने लगा। “भाग्य भी आपका साथ दे रहा है।”

“अभी खत्म नहीं हुआ है, आगे सुनिए! मैंने एक नई टेबल ली है, जिसकी सतह पर शानदार लाल लैदर चढ़ा हुआ है। मैं कसम खाने को तैयार हूँ, और बैनिस्टर भी, कि वह साफ- सुथरी थी और उस पर कोई खरोंच भी नहीं लगी हुई थी। पर अब उसमें तीन इंच लम्बा एक गहरा कट लगा हुआ है – खाली खरोंच ही नहीं बल्कि एक पूरा कट है। सिर्फ यही नहीं, बल्कि मुझे टेबल पर काले आटे या शायद काली चिकनी मिट्टी की एक छोटी-सी बॉल मिली, जिसमे कुछ बुरादे के जैसे धब्बे चिपके हुए थे। मुझे यकीन है कि ये निशान उसी आदमी ने छोड़े हैं, जिसने मेरे पेपर के साथ छेड़छाड़ की है।

इसके अलावा वहाँ ना पैरों के निशान थे और ना ही उसकी पहचान के लिए और कोई दूसरे सबूत मिले। उस समय मैं अपनी निराशा के गहरे समुंदर में डूब चुका था, तभी अचानक मुझे याद आया कि इन दिनों आप भी इसी शहर में रुके हुए हैं, और मैं इस मामले को सीधा आपके हाथों में सौंपने चला आया। मेरी मदद करें, मिस्टर  होम्स! आप मेरी समस्या देखें। या तो मुझे उस आदमी को ढूँढना होगा या फिर एग्जाम्स को कुछ दिनों के लिए टालना होगा  जब तक कि नए पेपर तैयार होते हैं, पर यह काम बिना अपनी सफाई दिए नहीं किया जा सकता, हो सकता यह बात आगे जा के और बड़ा रूप लेले। ऐसा हुआ तो ना सिर्फ कॉलेज, बल्कि पूरी यूनिवर्सिटी की बदनामी होगी। और इसलिए सबसे पहले मैं चाहता हूँ कि यह मामला चुपचाप और सावधानी से सुलझा लिया जाए।”

“मुझे इस मामले को देखने, आपको सलाह देने में और जो कुछ भी मैं कर सकता हूँ करने में ख़ुशी होगी,” खड़े होकर, अपना कोट पहनते हुए होम्स ने कहा। “यह केस भी कम दिलचस्प नहीं है।  पेपर्स आपके पास आने के बाद क्या कोई आपसे मिलने कमरे में आया था?”

“हाँ; एक जवान लड़का, दौलत रास, वह एक इंडियन स्टूडेंट है, जो उसी फ्लोर में रहता है, और एग्जाम्स के बारे में कुछ पूछने मेरे पास आया था।” 
“इसी के लिए वह आया था?”
“हाँ।”
“और वह पेपर आपकी टेबल पर थे?”
“जहॉँ तक मुझे ध्यान है वे रोल किये हुए थे”
“लेकिन उन्हें एग्जाम प्रूफ के तौर पर पहचाना जा सकता है?”
“हाँ; ऐसा हो सकता है।”
“आपके कमरे में और कोई नहीं आया था?”
“जी नहीं।”
“क्या कोई जानता था कि ये एग्जाम प्रूफ वहाँ होंगे?”
“प्रिंटर के आलावा कोई भी नहीं।”

“क्या वह आदमी बैनिस्टर जानता था?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं। किसी को भी मालूम नहीं था।”
“बेनिस्टर अभी कहाँ है?”
“वह बहुत बीमार था, बेचारा। मैं उसे चेयर पर लेटाकर छोड़ आया। मैं आपके पास आने के लिए बहुत जल्दी में था।”
“आप अपना दरवाज़ा खुला छोड़ कर आये है ?”
 “मैंने पहले एग्जाम पेपर को लॉक करके रखा दिया है।”
“इसका मतलब यह है, मिस्टर सोम्स, कि अगर उस इंडियन स्टूडेंट ने उन पेपर के रोल को एग्जाम प्रूफ के रूप में नहीं पहचाना, तो वह आदमी जिसने उन् पेपर के साथ छेड़छाड़ की, वह इत्तेफ़ाक़ से ही उन तक पहुंचा था, बिना यह जाने कि वो पेपर्स वहां हैं।”

“मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है।”

Puri Kahaani Sune…

(hindi) The Adventure of the Dying Detective

(hindi) The Adventure of the Dying Detective

“शरलॉक  होम्ज़ की मकान मालकिन मिसेज हडसन बड़ी दुखियारी औरत थी. एक तो उनके फर्स्ट फ्लोर के फ्लैट में आये दिन आवारा लोगो का जमावड़ा लगा रहता था और ऊपर से उनके सनकी किरायेदार ने उनकी नाक में दम कर रखा था. वो किरायेदार, जिसकी जिंदगी में डिसप्लीन नाम की कोई चीज़ नहीं थी, अव्वल दर्जे का आलसी था. उसकी बड़ी बेढंगी सी दिनचर्या थी और ऊपर से वो घर के अंदर ही रिवाल्वर चलाने की प्रैक्टिस किया करता था.

उसे वक्त-बेवक्त ऊँची आवाज़ में म्यूजिक बजाने का बड़ा शौक था और आये दिन अजीबो-गरीब साइंटिफिक एक्सपेरिमेंट करता रहता था. मारपीट और लड़ाई-झगड़े में भी हरदम आगे रहता, उसकी इन्ही बुरी आदतों ने उसे लंदन का सबसे घटिया किरायेदार बना दिया था. पर इसके बावजूद वो काफी भारी-भरकम किराया देता था और मुझे इस बात पर कोई शक नहीं हैं  कि वो मकान भी उसी रकम से खरीदा गया होगा जो होम्ज़ किराए के तौर पर चुकाता था, और ये उन दिनों की बात हैं  जिन दिनों मैं उसके साथ रहा करता था. 

मकान मालकिन बेचारी हैं रान परेशान रहती थी पर उसकी जिंदगी में कभी दखलअंदाजी नहीं करती थी चाहे वो कितना ही बवाल क्यों ना मचाए बल्कि यूं कह सकते हैं  कि वो उसे काफी पसंद करती थी क्योंकि वो औरतों के साथ बेहद तमीज़ और तहजीब से पेश आता था. एक बहादुर और जवान मर्द होने के बावजूद उसने कभी किसी औरत पर बुरी नजर नहीं डाली और ना ही उसे किसी औरत के साथ संबंध बनाने में रूचि थी. मुझे मालूम था कि मिसेज हडसन उसकी बड़ी ईज्जत करती हैं  और  इसीलिए मेरी शादी के एक साल बाद जब उन्होंने मेरे घर आकर मेरे दोस्त की बदहाली का किस्सा सुनाया तो मुझसे रहा नहीं  गया. 

मिसेज हडसन ने मुझे बताया, “वो मर रहा हैं  डॉक्टर वॉटसन. पिछले तीन दिनों से उसकी हालत बेहद नाज़ुक हैं , मुझे नहीं लगता कि उसके बचने की कोई उम्मीद हैं . उसने मुझे डॉक्टर को बुलाने से मना किया हैं . आज सुबह जब मैंने उसे देखा तो उसके चेहरे पर सिर्फ हड्डियाँ नजर आ रही थी, उसकी चमकदार आँखे जिस तरह से मुझे देख रही थी, मैं बर्दाश्त नहीं कर पाई तो मैंने उससे कहा, “ आप चाहे मानें या ना मानें मिस्टर होम्ज़ पर मैं  अभी इसी वक्त डॉक्टर को बुलाने जा रही हूँ” 
तो उसने जवाब दिया, “अगर ऐसी बात हैं  तो वॉटसन को बुलाकर लाओ” 

“अब जल्दी से मेरे साथ चलिए सर, वर्ना आप उसे फिर कभी जिंदा नहीं देख पायेंगे” मिसेज हडसन विनती करते हुए बोली. 
मिसेज हडसन के मुंह से शरलॉक का ये हाल सुनकर मैं  हैं रान रह गया, मुझे उसकी बीमारी का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं  था. कहने की जरूरत नहीं  हैं  कि मैं  उसी वक्त अपना कोट और हैं ट पहनकर मिसेज हडसन के साथ चल पड़ा. उनके घर की तरफ जाते हुए मैंने उनसे शरलॉक के बारे में और बातें पूछी. 

“”मुझे ज्यादा कुछ नहीं  पता, बस इतना मालूम हैं  कि वो रोथरर्हाईथ  (Rotherhithe) के किसी केस पर काम कर रहे थे, नदी के पास वाली गली में. और जब से वो वहां से लौटे हैं, तभी से बीमार हैं . बुधवार के दिन वो बीमार पड़े थे और तब से बिस्तर पर हैं. तीन दिनों से उन्होंने अन्न का एक दाना और पानी का एक घूँट तक नहीं पिया हैं “” 
“”हे भगवान्! तो आपने डॉक्टर को फोन क्यों नहीं  किया ?’ मैंने पूछा 

“”वो मुझे करने ही नहीं देते थे सर, आप को तो पता हैं  वो कितने जिद्दी हैं , और उनकी बात टालने का साहस मुझमें नहीं  हैं . पर वो अब ज्यादा दिन नहीं जी पायेंगे, उन्हें देखने के बाद आपको खुद यकीन हो जायेगा”  

मिसेज हडसन ने ठीक ही कहा था, शरलॉक  हवाकई में काफी बीमार था. नवम्बर की धुंध में हल्की रौशनी में शरलॉक  होम्ज़ के रूम में एक अजीब सी उदासी फैली हुई थी. मुझे शरलॉक  होम्ज़ का कमजोर और मुर्झाया चेहरा दिखाई दिया जो अपने बिस्तर पर लेटा मेरी तरफ देख रहा था. उसकी हालत देखकर मेरी रीड़ की हड्डी में एक ठंडी लहर दौड़ गई. उसकी आँखे तेज़ बुखार से जल रही थी, दोनों गाल भी बुखार की वजह से अंगारे की तरह लाल थे, होंठो पर पपड़ी जमी हुई थी, उसके पतले हाथ लिहाफ के ऊपर से काँपे, उसकी आवाज़ ऐसी सुनाई दे रही थी जैसे किसी गहरे कुएं से आ रही हो.  मैं  जब रूम में आया तो वो एक बेजान लाश की तरह पड़ा था, पर मुझे देखते ही उसकी आँखे चमक उठी, उसने मुझे देखते ही पहचान लिया. 

“”वेल, वॉटसन लगता हैं  हमारा बुरा वक्त चल रहा हैं . उसने बेहद कमजोर आवाज़ में कहा जो उसके पहले वाले बेफिक्र अंदाज से एकदम अलग था. 
मुझे उसकी हालत पर तरस और रोना दोनों आ रहा था, मैं  उसकी तरफ बढ़ते हुए बोला “”मेरे प्यारे दोस्त! 
पर इससे पहले कि मैं  उसके करीब जाता, उसने पूरी ताकत से चिल्लाते हुए कहा “”पीछे हटो! एकदम पीछे हटो”. मैं  हडबडा कर तुंरत वही रुक गया. 
“”अगर तुम मेरे पास भी आए वॉटसन तो तुम्हें  इस घर से बाहर जाना होगा” शरलॉक बोला. 
“”मगर क्यों? मैंने हैं रानी से पूछा 

“”क्योंकि मैं  चाहता हूँ, क्या ये वजह काफी नहीं हैं ” 
मिसेज हडसन ठीक बोलती थी, उसका रौब ही कुछ ऐसा था कि उसके पास जाने की मेरी हिम्मत नहीं  हुई पर उसकी हालत पर मुझे तरस आ रहा था. 
“”मैं  तो सिर्फ यहाँ मदद करने आया था” मैंने सफाई दी. 
“”बिल्कुल! मेरी मदद तुम तभी कर पाओगे जब तुम मेरी बात मानोगे” शरलॉक  बोला. 
“”बिल्कुल होम्ज़, मैं  तुम्हारी हर बात मानूंगा ” मैंने कहा 
मेरी बात सुनकर उसे थोड़ी तसल्ली हुई. 

“”तुम नाराज़ नहीं हो? उसने बड़ी मुश्किल से सांस भरते हुए पूछा 
“ओह गॉड! मैं  तुमसे भला नाराज़ कैसे हो सकता हूँ जब तुम इस हालत में मेरे सामने लेटे हो?  
“”इसमें तुम्हारी ही भलाई हैं  वॉटसन?’ उसने कहा 
“”मेरी भलाई? 

“”मैं  जानता हूँ कि मुझे क्या हुआ हैं . ये सुमात्रा की बीमारी  हैं  जिसे कुली डिजीज बोलते हैं —इसके बारे में डच हमसे ज्यादा जानते हैं  पर उनके पास भी इसका कोई ईलाज नहीं  हैं . पर एक बात पक्की हैं , ये बीमारी बेहद जानलेवा हैं  और बड़ी तेज़ी से फैलती हैं ” 
बुखार की तेज़ी अब उसके सर चढ़ रही थी, वो बहुत उत्तेजित हो गया था. वो अपने पतले लंबे हाथ हिलाते हुए मुझे अपने से दूर रहने का इशारा कर रहा था. 
“”ये बीमारी  छूने से फैलती हैं , वॉटसन, इसलिए तुम बस मुझसे दूर रहो” 
“”ओह गॉड, होम्ज़! क्या तुम्हें लगता हैं  कि इस बात का मुझ पर कोई असर होगा? अगर कोई अजनबी भी होता तो मुझे परवाह नहीं होती, तो तुम सोच भी कैसे सकते हो कि ये मुझे अपने पुराने और क़रीबी दोस्त के लिए अपनी ड्यूटी को करने से रोक सकता हैं ?”  

मैं दोबारा उसके पास जाने की कोशिश की मगर उसकी गुस्से से भरी आँखे मुझे घूरने लगी और मैं  वही रुक गया. 
“”अगर तुम वही रुकोगे तो मैं  बात करूंगा. अगर नहीं तो तुम मेरे रूम से निकल जाओ” होम्ज़ बोला. 

होम्ज़ के अंदर कुछ ऐसी ख़ास बाते थे जिनकी मैं  दिल से कद्र करता था और इसीलिए मैं  उसकी हर बात चुपचाप मान लेता था, बेशक मुझे उसकी कई बात समझ नहीं आती थी पर मैंने कभी उसका विरोध नहीं  किया. पर इस वक्त मेरे अंदर का डॉक्टर जाग उठा था. बेशक मैं  उसकी हर बात मानता हूँ पर इस वक्त नहीं, इस वक्त मैं  सिर्फ एक डॉक्टर हूँ और वो मेरा मरीज. 
“”होम्ज़, तुम अपने होश में नहीं हो. एक बीमार आदमी बच्चे जैसा जिद्दी हो जाता हैं  इसलिए मैं  तुम्हारा ईलाज करने आया हूँ. तुम चाहे बुरा मानो या भला पर मैं  तुम्हें चेक  करके तुम्हारा ट्रीटमेंट शुरू कर रहा हूँ” मैं  बोला. 

उसकी आँखों से साफ़ गुस्सा झलक रहा था पर मैंने ज़रा भी परवाह नहीं  की. 
“”अगर मुझे डॉक्टर की जरूरत हैं  तो कम से कम कोई ऐसा तो हो जिस पर मुझे भरोसा हो” होम्ज़ बोला. 
“”तो क्या तुम्हें  मुझ पर भरोसा नहीं  हैं ?’ मैंने पूछा 
“”तुम्हारी दोस्ती पर तो पूरा भरोसा हैं  पर जो सच हैं , वो सच हैं  वॉटसन और आखिरकार तुम एक आम डॉक्टर हो और तुम्हारी क्वालिफिकेशन भी कुछ ख़ास नहीं  हैं  और ना ही तुम्हें  ज्यादा एक्सपीरिएंस हैं . 

Puri Kahaani Sune..

(hindi) AANSUON KI HOLI

(hindi) AANSUON KI HOLI

“नामों को बिगाड़ने की रीत न-जाने कब चली और कहाँ से शुरू हुई। अगर आप हर जगह फैली इस बीमारी का पता लगा पाए, तो आप मशहूर हो जाएँगे। पंडित जी का नाम तो श्रीविलास था; पर दोस्त लोग सिलबिल कहा करते थे। नामों का असर स्वभाव पर कुछ न कुछ पड़ जाता है। बेचारे सिलबिल सचमुच ही सिलबिल थे। ऑफिस जा रहे हैं; मगर पजामे का नाड़ा नीचे लटक रहा है। सिर पर फेल्ट-कैप है; पर लम्बी-सी चुटिया पीछे झाँक रही है, कोट ऐसे बहुत सुन्दर है।

न जाने उन्हें त्योहारों से क्या चिढ़ थी। दिवाली गुजर जाती पर वह भला इंसान जूआ नहीं खेलता। और होली का दिन तो उनके लिए बड़ी परीक्षा का दिन था। तीन दिन वह घर से बाहर न निकलते। घर पर भी काले कपड़े पहने बैठे रहते। दोस्त इस ताक में रहते कि शायद वो हाथ आ जाएँ मगर घर में घुस कर उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता था।

एक-आध बार फँसे भी, मगर रो गा कर बच के निकल गये। लेकिन अबकी परेशानी बहुत मुश्किल हो गयी थी। शास्त्रों के द्वारा बताए गए समय तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के बाद उन्होंने शादी की थी। ब्रह्मचर्य के पूरे होने में जो थोड़ी-बहुत कमी बची थी, वह गौने मे लगने वाले तीन साल के समय ने पूरी कर दी। हालांकि उन्हें औरतों से कोई परेशानी नहीं थी लेकिन वह औरतों को सर चढ़ाना पसंद नहीं करते थे। इस मामले में उन्हें अपनी वही पुरानी सोच पसंद था।

बीवी को जब जोर से डाँट दिया, तो उसकी हिम्मत नहीं कि वो रंग को छुए। परेशानी यह थी कि ससुराल के लोग भी होली मनाने आने वाले थे। पुरानी कहावत है : 'बहन अंदर तो भाई सिकंदर'। इन सिकंदरों के हमले से बचने का उन्हें कोई तरीका नहीं सूझता था। दोस्त लोग घर में न जा सकते थे; लेकिन सालों को कौन रोक सकता है ?

बीवी ने आश्चर्य से कहा —अरे भैया ! क्या सचमुच रंग घर न लाओगे ? यह कैसी होली है, बाबा ?
सिलबिल ने गुस्से से कहा —बस, मैंने एक बार कह दिया और बात दोहराना मुझे पसंद नहीं। घर में रंग नहीं आयेगा और न कोई छुएगा ? मुझे कपड़ों पर लाल छींटे देख कर उल्टी आने लगती है। हमारे घर में ऐसी ही होली होती है।

बीवी ने सिर झुका कर कहा —तो न लाना रंग-संग, मुझे रंग ले कर क्या करना है। जब तुम्हीं रंग न छुओगे, तो मैं कैसे छू सकती हूँ।

सिलबिल ने ख़ुश हो कर कहा —यकीनन यही अच्छी बीवी का फर्ज है।
'लेकिन भैया तो आने वाले हैं। वह क्या मानेंगे ?'

'उनके लिए भी मैंने एक उपाय सोच लिया है। उसे पूरा तुम्हें करना है। मैं बीमार बन जाऊँगा। एक चादर ओढ़ कर लेटा  रहूँगा। तुम कहना इन्हें बुखार आ गया। बस; चलो छुट्टी हुई।'

बीवी ने आँख नचा कर कहा —हे भगवान; कैसी बातें मुँह से निकालते हो ! बुखार हो तुम्हारे दुश्मन को, यहाँ आये तो मुँह जला दूँ उसका।
'तो फिर और क्या तरीका है ?' 
'तुम ऊपरवाले छोटे कमरे में छिपे रहना, मैं कह दूँगी, उन्होंने दस्त की दवाई ली है। बाहर निकलेंगे तो हवा लग जायगी।'

पंडित जी खुश हो गए , बस, बस, यही सबसे अच्छा तरीका है। 1389 होली का दिन है। बाहर हल्ला मचा हुआ है। पुराने समय में अबीर और गुलाल के सिवा और कोई रंग न खेला जाता था। अब नीले, हरे, काले, सभी रंगों का मेल हो गया है और इनसे बचना आदमी के लिए तो मुमकिन नहीं। हाँ, देवता बचें। सिलबिल के दोनों साले मुहल्ले भर के आदमी, औरतों, बच्चों और बूढ़ों का निशाना बने हुए थे। बाहर के दीवान खाने की ज़मीन, दीवारें , यहाँ तक की तसवीरें भी रंग उठी थीं। घर में भी यही हाल था। मुहल्ले की ननदें भला कब मानने लगी थीं। नाली तक रंगीन हो गई थी।

बड़े साले ने पूछा—क्यों री चम्पा, क्या सचमुच उनकी तबीयत अच्छी नहीं ? खाना खाने भी न आए ?
चम्पा ने सिर झुका कर कहा —हाँ भैया, रात से ही पेट में कुछ दर्द होने लगा। डाक्टर ने हवा में निकलने को मना कर दिया है।

थोड़ी देर बाद छोटे साले ने कहा —क्यों जीजी, क्या भाई साहब नीचे नहीं आयेंगे ? ऐसी भी क्या बीमारी है ! कहो तो ऊपर जा कर देख आऊँ। चम्पा ने उसका हाथ पकड़ कर कहा —नहीं-नहीं, ऊपर मत जाना ! वह रंग-वंग न खेलेंगे। डाक्टर ने हवा में निकलने को मना कर दिया है।

दोनों भाई हाथ मल कर रह गये। तभी छोटे भाई को एक बात सूझी , जीजा जी के कपड़ों के साथ क्यों न होली खेलें। वे तो बीमार नहीं हैं। बड़े भाई के मन में यह बात बैठ गयी। बहन बेचारी अब क्या करती ? सिकंदरों ने चाबियां उसके हाथ से लीं और सिलबिल के सारे कपड़े निकाल-निकाल कर रंग डाले। रूमाल तक न छोड़ा। जब चम्पा ने उन कपड़ों को आँगन में रस्सी पर सूखने को डाले तो ऐसा लगा, मानो किसी कपड़े रंगने वाले ने शादी के जोड़े रँगे हों।

सिलबिल ऊपर बैठे-बैठे यह तमाशा देख रहे थे; पर कुछ बोल न पाए। उनकी छाती पर साँप-सा लोट रहा था। सारे कपड़े खराब हो गये, ऑफिस जाने को भी कुछ न बचा। इन बदमाशों को मेरे कपड़ों से न जाने क्या दुश्मनी थी। घर में तरह तरह के अच्छे पकवान बन रहे थे। मुहल्ले की एक ब्राह्मणी के साथ चम्पा भी जुटी हुई थी।

Puri Kahaani Sune..

(hindi) Dussahas

(hindi) Dussahas

“लखनऊ के नौबस्ते मोहल्ले में एक मुंशी मैकूलाल मुख्तार रहते थे। बड़े उदार, दयालु और अच्छे आदमी थे। अपने काम में इतने अच्छे थे कि ऐसा शायद ही कोई मुकदमा होता था जिसमें वह किसी न किसी ओर से न रखे जाते हों। साधु-संतों से भी उन्हें प्यार था। उनके सत्संग से उन्हे कुछ धार्मिक बातें सीख लीं थीं और कुछ गाँजे-चरस की आदत लगा लीं थीं। रही शराब, यह उनकी खानदानी परंपरा थी। शराब के नशे में वह कानूनी ड्राफ्ट खूब लिखते थे, उनका दिमाग काम करने लगता था। गाँजे और चरस का असर उनके दिमाग पर पड़ता था।

दम लगा कर वह सबसे मन हटाकर ध्यान में मग्न हो जाते थे। मोहल्लेवालों पर उनका बड़ा रोब था। लेकिन यह उनकी कानूनी प्रतिभा का नहीं, उनकी दयालु अच्छाई का फल था। मोहल्ले के घोड़ागाड़ी वाले, दूध वाले और पानी भरने वाले उनकी बात मानते थे, सौ काम छोड़ कर उनका काम करते थे। उनकी शराब से पैदा हुई दयालुता ने सबों को वस में कर लिया था। वह रोज अदालत से आते ही पानी भरने वाले अलगू के सामने दो रुपये फेंक देते थे। कुछ कहने-सुनने की जरूरत न थी, अलगू इसका मतलब समझता था। शाम को शराब की एक बोतल और कुछ गाँजा और चरस मुंशी जी के सामने आ जाता था। बस, महफिल जम जाती। यार लोग आ पहुँचते।

एक ओर मुवक्किलों की कतार बैठती, दूसरी ओर दोस्तों की। सन्यास की और ज्ञान की बातें होने लगती। बीच-बीच में मुवक्किलों से भी मुकदमे की दो-एक बातें कर लेते ! दस बजे रात को वह सभा खत्म होती थी। मुंशी जी अपने काम और ज्ञान की बातों के सिवा और कोई दर्द सिर मोल न लेते थे। देश के किसी आन्दोलन, किसी सभा, किसी सामाजिक सुधार से उनका कोई लेना देना न था। इस सब से वे सच में दूर थे। बंग-भंग हुआ, नरम-गरम दल बने, राजनैतिक सुधारों आए, आजादी की इच्छा ने जन्म लिया, खुद को बचाने की आवाजें देश में गूँजने लगीं, लेकिन मुंशी जी की शांति में जरा भी खलल न पड़ा। अदालत और शराब के सिवाय वह दुनिया की सभी चीजों को धोखा समझते थे, सभी से उदासीन रहते थे।

दिये जल चुके थे। मुंशी मैकूलाल की सभा जम गयी थी, उन्हें मानने वाले जमा हो गये थे, अभी तक शराब न आई थी। अलगू बाजार से न लौटा था। सब लोग बार-बार बेचैन नजरों से देख रहे थे। एक आदमी बरामदे में इंतजार कर रहा था, दो-तीन लोग खोज लेने के लिए सड़क पर खड़े थे, लेकिन अलगू आता नजर न आता था। आज जीवन में पहला मौका था कि मुंशी जी को इतना इंतजार खींचना पड़ा। उनकी इंतजार से पैदा हुई बेचैनी ने गहरी चुप्पी का रूप ले लिया था, न कुछ बोलते थे, न किसी ओर देखते थे। पूरी ताकत इंतजार करने के लिए इकट्ठा हो गयीं।

अचानक खबर मिली कि अलगू आ रहा है। मुंशी जी जाग पड़े, दोस्त खिल गये, बैठने का तरीका बदल कर सँभल बैठे, उनकी आँखें खील गयीं। उम्मीद भरा इंतजार खुशी को और बढ़ा देता है।

एक पल में अलगू आ कर सामने खड़ा हो गया। मुंशी जी ने उसे डाँटा नहीं, यह पहली गलती थी, इसका कुछ न कुछ कारण जरूर होगा, दबे हुए पर बेचैन नजरों से अलगू के हाथ की ओर देखा। बोतल न थी। आश्चर्य हुआ, यकीन न आया, फिर गौर से देखा बोतल न थी। यह असधारण घटना थी, पर इस पर उन्हें गुस्सा न आया, नम्रता के साथ पूछा- “”बोतल कहाँ है ?””

अलगू- “”आज नहीं मिली।””

मैकूलाल- “”यह क्यों ?””

अलगू- “”दूकान के दोनों नाके रोके हुए आजादी वाले खड़े हैं, किसी को उधर जाने ही नहीं देते।””

अब मुंशी जी को गुस्सा आया, अलगू पर नहीं, आजादी के लिए लड़ने वालों पर। उन्हें मेरी शराब बन्द करने का क्या हक है ? समझने के भाव से बोले- “”तुमने मेरा नाम नहीं लिया ?””

अलगू- “”बहुत कहा, लेकिन वहाँ कौन किसी की सुनता था ? सभी लोग लौटे आते थे, मैं भी लौट आया।””

मुंशी- “”चरस लाये ?””

अलगू- “”वहाँ भी यही हाल था।””

मुंशी- “”तुम मेरे नौकर हो या आजादी वालों के ?””

अलगू- “”मुँह काला करवाने के लिए थोड़े ही नौकर हूँ ?””

मुंशी- “”तो क्या वहाँ बदमाश लोग मुँह में काला भी लगा रहे हैं ?””

अलगू- “”देखा तो नहीं, लेकिन सब यही कहते थे।””

मुंशी- “”अच्छी बात है, मैं खुद जाता हूँ, देखूँ किसकी हिम्मत है जो रोके। एक-एक को जेल का रास्ता दिखा दूँगा, यह सरकार का राज है, कोई गुंडा राज नहीं है। वहाँ कोई पुलिस का सिपाही नहीं था ?””

अलगू- “”थानेदार साहब खुद ही खड़े सबसे कहते थे जिसका जी चाहे जाय शराब ले या पीये लेकिन लौट आते थे, उनकी कोई न सुनता था।””

मुंशी- “”थानेदार मेरे दोस्त हैं, चलो जी ईदू चलते हो। रामबली, बेचन, झिनकू सब चलो। एक-एक बोतल ले लो, देखूँ कौन रोकता है। कल ही तो मजा चखा दूँगा।

Puri kahaani Sune..

(hindi) Kaidi

(hindi) Kaidi

“चौदह साल तक लगातार मानसिक और शारीरिक तकलीफ भोगने के बाद आइवन ओखोटस्क जेल से बाहर निकला; पर उस परिंदे की तरह नहीं, जो शिकारी के पिंजरे से पर कटाकर  निकला हो बल्कि उस शेर की तरह  जिसे पिन्जरे की दीवारों ने और भी ज्यादा खूंख्वार और खून का प्यासा बना दिया हो। उसके दिल में एक आग लगी थी जिसकी लपटों ने उसके ताकतवर और लोहे से मजबूत जिस्म को और दिल के जज्बातों को जला कर राख कर डाला था और आज उसके एक-एक नस में चिंगारी भरी हुई थी.

वो भूख से बेहाल हुआ जा रहा था. बगावत का तूफ़ान उसके चेहरे से झलक रहा था. जेलर ने उसका वज़न तौला. जेल में आते वक्त हट्टा कट्टा था, आज कमज़ोर होकर बाहर निकला था। जेलर ने हमदर्दी दिखाते हुए उससे कहा “ तुम बहुत कमज़ोर हो गये हो, आइवन। अगर जरा भी बीमार पड़े तो बुरा होगा। आइवन ने अपने हड्डियों के ढॉचे जैसे जिस्म को बड़े नाज़ से देखा और खुद के अंदर एक ज़लज़ला  सा महसूस करते हुए जवाब दिया” क़ौन कहता है कि मैं कमज़ोर हो गया हूँ ?’
'तुम खुद देख रहे होगे” जेलर बोला। 
'दिल की आग जब तक नहीं बुझेगी, आइवन नहीं मरेगा, मि. जेलर, सौ साल तक भी नहीं, यकीन रखिए” आइवन ने जवाब दिया।
 
आइवन ऐसी ही बहकी-बहकी सी बातें किया करता था, इसलिए जेलर ने उसे ज्यादा भाव नही दिया। वैसे भी सबको लगता था कि वो आधा पागल है । कुछ लिखा-पढ़ी के बाद उसके कपड़े और किताबे मँगवा कर उसे दे दिए गए । पर उसके पहले के सूट अब किसी और के लगते थे । कोटों की जेबों से कई सारे रुपए निकले, कई नगद रूबेल। उसने सबकुछ वहीं जेल के वार्डरों और साफ़-सफाई करने वालो मुलाज़िमों को दे दिया । ऐसा लग रहा था जैसे उसे कोई राज मिल गया हो और उसे अब इन चीजों की जरूरत ही नहीं है । 

जेलर ने कहा, ‘यह नहीं हो सकता, आइवन ! तुम सरकारी मुलाज़िमों को घूस नहीं दे सकते।‘
आइवन बच्चो की तरह मासूमियत से हसंते हुए बोला” यह घूस नहीं है, मि. जेलर ! घूस देकर अब मुझे इनसे क्या फायदा होगा ?  नाराज़ होकर अब ये मेरा क्या बिगाड़ लेंगे और खुश होकर मुझे क्या दे देंगे ? ये कोई घूस नहीं बल्कि इनकी रहमदिली का ईनाम है जिसकी वजह से मेरा यहाँ चौदह साल तो क्या चौदह घंटे रहना भी मुश्किल हो जाता।‘

जब वह जेल के दरवाजे से बाहर निकला तो जेलर और बाकि मुलाज़िम उसे गाड़ी तक पहुँचाने आए । 
कोई पन्द्रह साल पहले की बात है । आइवन मास्को के एक बेहद अमीर और खानदानी घर का लाड़ला बेटा था । उसने स्कूल में ऊँची तालीम पायी थी साथ ही वो खेल-कूद में भी काफी माहिर था । वो एक नर्मदिल, बेखौफ और खुशमिजाज़ नौजवान था। दिल शीशे सा साफ़ था, किसी कमज़ोर पर ज़ुल्म होते नहीं देख सकता था और बहादुर इतना कि बड़े से बड़े तूफ़ान का सामना कर जाए । उसके साथ हेलेन नाम की एक लड़की पढ़ती थी, जिस पर स्कूल के के सारे लड़के जान देते थे।

वह जितनी  हसीन थी, उतनी ही तेज़-तर्रार भी. अपने ही ख्यालो में खोई रहती थी पर अपने ज़ज्बात दिल की गहराईयों में छुपा कर रखती थी । ये कहना मुश्किल था कि उसे आइवन में ऐसा क्या नजर आया जो वो उस पर दिलो-जान से फ़िदा हो गई। दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क था । आइवन घूमने-फिरने वाला और शराब का शौकीन था तो हेलेन शेरो-शायरी और नाच-गाने पर जान देती थी।  

आइवन की नज़रो में पैसा सिर्फ और सिर्फ दोनों हाथो से उड़ाने वाली चीज़ थी जबकि हेलेन अव्वल दर्जे की कंजूस थी । आइवन के लिए स्कूल का लेक्चर-हॉल किसी जेल से कम नहीं था और हेलेन इसी समुंद की मछली थी । उन दोनों की फितरत में जमीन-आसमान का फर्क था और यही फर्क उन्हें एक दुसरे के करीब खींच लाया था जो आखिरकार उनकी मोहब्बत का सबब बन गई ।

 जब आइवन ने हेलेन से अपने प्यार का इज़हार करते हुए उससे शादी करने की मर्ज़ी ज़ाहिर की तो हेलेन भी मना नही कर सकी. दोनों किसी शुभ घड़ी में शादी करके सुहागरात मनाने के लिए किसी सुंदर सी पहाड़ी जगह पर जाना चाहते थे. अभी उनके ख्वाब पूरे भी नहीं हुए थे कि अचानक सियासी उठा-पटक ने उनकी जिंदगी को अपनी लपेट में ले लिया । हेलेन तो पहले से ही वतनपरस्त थी, उसकी देखा-देखी आइवन भी उसके रंग में रंग गया । वो रईस खानदानी लड़का था और उसके लिए आम लोगो का साथ देना काफी मुश्किल फैसला था । वो जब कभी इस कशमकश में उलझ कर मायूस होता तो हेलेन उसे हौंसला बंधाती थी और आइवन उसकी बेपनाह मोहब्बत और जूनून देखकर अपनी कमजोरी पर शर्मिंदा हो उठता। 

Puri Kahaani Sune…

(hindi) Motor Ke Chheente

(hindi) Motor Ke Chheente

“क्या नाम कि… सुबह नहा धोकर-पूजा पाठ से निपट कर , तिलक लगाकर, पीताम्बर पहन, खड़ाऊँ पाँव में डाले, बगल में पत्रा दबाकर एक जजमान के घर चला। शादी की जगह के बारे में सोचना था। अच्छा पैसा लगाने वाले लोग थे। ऊपर से खाना पीना और मेरा खान पान मामूली नहीं है। बाबुओं को तो मुझे बुलाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। उनका महीने-भर का नाश्ता मेरा एक दिन का खान पान है। इस बारे में तो हम अपने सेठों-साहूकारों के दीवाने हैं, वो ऐसा खिलाते हैं, ऐसा खिलाते हैं, और इतने खुले मन से कि पेट ख़ुश हो उठता है। जजमान का दिल देखकर ही मैं उनका न्योंता स्वीकार करता हूँ। खिलाते समय किसी ने रोनी सूरत बनायी और मेरी भूख गायब हुई। रोकर किसी ने खिलाया तो क्या ? ऐसा खाना कम-से-कम मुझे नहीं पचता। जजमान ऐसा चाहिए कि ललकारता जाय “लो शास्त्रीजी, एक बालूशाही और, मैं कहता जाऊँ … नहीं जजमान अब नहीं !”

रात खूब बारिश हुई थी, सड़क पर जगह-जगह पानी जमा था। मैं अपने विचारों में मगन चला जा रहा था कि एक मोटर छप-छप करती हुई निकल गयी। मेरे मुँह पर छींटे पड़े। जो देखा तो धोती पर मानो किसी ने कीचड़ घोलकर डाल दिया हो। कपड़े गंदे हुए, वह अलग, शरीर मैली हुई, वह अलग, पैसे का जो नुक्सान हुआ, वह अलग। अगर मोटर वालों को पकड़ पाता, तो ऐसी मरम्मत करता कि वे भी याद करते। मगर मैं मन मसोसकर रह गया। इस वेश में जजमान के घर तो जा नहीं सकता था, अपना घर भी मील-भर से कम दूर न था। फिर आने-जाने वाले सब मेरी ओर देख-देखकर तालियाँ बजा रहे थे। ऐसी दुर्गति मेरी कभी नहीं हुई थी। अब क्या करोगे ? घर जाओगे, तो पण्डिताइन क्या कहेंगी ?

मैंने चटपट अपने कर्तव्य फ़ैसला कर लिया। इधर-उधर से दस-बारह पत्थर के टुकड़े बटोर लिये और दूसरी मोटर की राह देखने लगा। ब्रह्म का तेज मेरे सिर पर चढ़ बैठा ! अभी दस मिनट भी न गुजरे होंगे कि एक मोटर आती हुई दिखायी दी ! ओहो वही मोटर थी। शायद मालिक को स्टेशन से लेकर लौट रही थी। वो जैसे ही करीब आयी, मैंने एक पत्थर चलाया, भरपूर जोर लगाकर चलाया। साहब की टोपी उड़कर सड़क के उस बाजू पर गिरी। मोटर की चाल धीमी हुई। मैंने दूसरा पत्थर फेंका। खिड़की के शीशे चूर-चूर हो गये और एक टुकड़ा साहब बहादुर के गाल में भी लगा। खून बहने लगा। मोटर रुकी और साहब उतरकर मेरी तरफ आये और घूँसा तानकर बोले ‘बदतमीज़, हम तुमको पुलिस में देगा।

 इतना सुनना था कि मैंने पोथी-पत्री जमीन पर फेंकी और साहब की कमर पकड़कर लंगड़ी  लगायी, तो वो कीचड़ में झट-से गिर पड़े। मैंने चट सवारी गाँठी और गरदन पर पचीस चांटे ताबड़तोड़ जमाये कि साहब चौंधिया गये। इतने में उनकी पत्नीजी उतर आयीं। ऊँची एड़ी का जूता, रेशमी साड़ी, गालों पर पाउडर, होंठों पर रंग, भॅवों पर स्याही, मुझे छाते से मारने लगीं। मैंने साहब को छोड़ दिया और डंडा संभालता हुआ बोला, ‘देवीजी, आप मरदों के बीच में न पड़ें, कहीं चोट-चपेट आ जाय, तो मुझे दु:ख होगा।

 साहब ने मौका देखा, तो संभलकर उठे और अपने बूटदार पैरों से मुझे एक ठोकर जमायी। मेरे घुटने में बड़ी चोट लगी। मैंने बौखलाकर डंडा उठा लिया और साहब के पाँव में जमा दिया। वह कटे पेड़ की तरह गिरे।

मेम साहब छतरी तानकर दौड़ीं। मैंने धीरे से उनकी छतरी छीनकर फेंक दी। ड्राइवर अभी तक बैठा था। अब वह भी उतरा और छड़ी लेकर मुझ पर पिल पड़ा। मैंने एक डंडा उसे भी जमाया, वो लोट गया। पचासों आदमी तमाशा देखने जमा हो गए।

साहब भूमि पर पड़े-पड़े बोले, ‘rascal, हम तुमको पुलिस में देगा।‘ मैंने फिर डंडा सँभाला और चाहता था कि खोपड़ी पर जमाऊँ कि साहब ने हाथ जोड़कर कहा, ‘नहीं नहीं, बाबा, हम पुलिस में नहीं जायगा, माफी दो।

Puri Kahaani Sune….

See You at the Top (English)

See You at the Top (English)

“Why you should read this book

 

If you feel like you're in the bottom now, Zig Ziglar says that you only need six steps to be on the top. They are self-image, relationship, goals, attitude, work and desire. Take these steps and the door of opportunities, happiness, riches and good health will open for you. No matter who you are or where you came from, you have what it takes. If you want to upgrade and step up your life, this is the book for you.

 

Who should read this

 

Regular employees; Parents, teachers, managers, athletes; Anyone who wants to give more and achieve more

 

About the author

 

Zig Ziglar is a motivational speaker, author and salesman. He has written over 30 books. He worked as a motivational speaker for decades. Zig Ziglar is an expert salesman. He gave many lectures and seminars for salespeople all over America.

(hindi) The Adventure of Charles Augustus Milverton

(hindi) The Adventure of Charles Augustus Milverton

“मैं जिन घटनाओं के बारे में आपको बताने वाला हूँ, उन्हें बीते बहुत साल हो गए हैं, लेकिन फिर भी मैं उन्हें बताने में झिझक रहा हूँ। लंबे समय तक, बहुत एहतियात और गोपनीयता रखने पर भी, उन्हें लोगों के सामने रखना मुमकिन नहीं हो पाता; लेकिन अब जब इससे संबंधित मुख्य शख्स कानून की पहुँच से परे है, इस कहानी को बिना किसी को कोई नुकसान पहुंचाए बताया जा सकता है। यह मेरे और मिस्टर शरलॉक होम्स के करियर में एक बिलकुल अनोखा अनुभव था। उम्मीद करता हूँ कि  अगर मैं कोई तारीख या हकीक़त  छुपाता हूँ, जिससे की उस असल घटना का पता चल सके, तो इसे पढ़ने वाले मुझे माफ़ करेंगे। 

होम्स और मैं, हम एक शाम टहलने निकले हुए थे. उस ठंडी, बर्फ़ीली सर्दियों की शाम से हम लगभग छह बजे तक वापस लौटे। जैसे ही होम्स ने लैंप जलाया, उसकी रोशनी टेबल पर रखे एक कार्ड पर पड़ी। उसने इस पर नजर डाली, और गुस्से के साथ उसे फर्श पर फेंक दिया। मैंने उसे उठाया और पढ़ा:-

चार्ल्स ऑगस्टस मिल्वर्टन ,
 ऐपलडोर टावर्स,
एजेंट।     हैम्पस्टेड। 

“यह कौन है?”  मैंने पूछा। 
“लंदन का सबसे बुरा आदमी” आग के सामने अपने पैर पसार कर बैठते हुए होम्स ने जवाब दिया। “क्या उस कार्ड के पीछे कुछ लिखा है?”
मैंने कार्ड को पलट कर देखा। 

“6:30 बजे मिलूंगा-चार्ल्स” मैंने पढ़ा।

“हम्म! वह आता ही होगा। क्या तुम्हें अजीब सा डर महसूस होता है, वॉटसन, जब तुम ज़ू (zoo) में साँपों के सामने खड़े होते हो और उन डरावनी आँखों और सपाट चेहरे वाले रेंगते, सरकते, ज़हरीले जानवरों को देखते हो? मिल्वर्टन  को देखकर मुझे कुछ ऐसा ही महसूस होता है। मैंने अपने करियर में पचासों ख़ूनी देखे हैं लेकिन बुरे से बुरे हत्यारे से भी मुझे इतनी घृणा नहीं हुई जितनी इस आदमी से होती है। पर फिर भी मुझे उससे काम पड़ ही जाता है – और सच कहूं तो, वह मेरे ही बुलाने पर यहाँ आ रहा है।”
“लेकिन वह कौन है?”

“मैं तुम्हें बताता हूँ, वॉटसन। वह सभी ब्लैकमेलरों का बाप है। भगवान हर इंसान को इस आदमी से बचाऐ, खास तौर पर औरतों को, जिनके राज और इज़्ज़त मिल्वर्टन  के हाथ लग जाती हैं। अपने मुस्कुराते हुए चेहरे और पत्थर दिल से वह उन्हें इतना मजबूर कर देगा कि वे कंगाल हो जायेंगे। यह आदमी अपने काम में बहुत माहिर है, और इसे कई सौदों में कामयाबी मिली होगी। उसका तरीका कुछ ऐसा है: वह जाहिर होने देता है कि वह ऐसे लेटर्स के लिए एक अच्छी-खासी रकम देने को तैयार है, जिनके इस्तेमाल से अमीर और ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों को ब्लैकमेल किया जा सके।

उसे इस तरह का सामान ना सिर्फ धोखेबाज़ नौकर या नौकरानियों से मिलता है बल्कि अक्सर भले लगने वाले उन बदमाशों से भी मिलता है, जो किसी मासूम औरत का प्यार और भरोसा जीत लेते है। वह अपने सौदों में कोई कंजूसी नहीं करता। मुझे पता चला कि उसने एक दरबान को सिर्फ दो लाइन के नोट के लिए 700 पाउंड दिए और यही नोट एक अच्छे भले परिवार की बर्बादी का कारण बना।

जो कुछ भी मार्किट में है वह मिल्वर्टन  के पास जाता है और इस शहर के सैकड़ों लोग हैं जो सिर्फ उसके नाम से डरते है। कोई नहीं जनता कि उसका शिकंजा किस पर पड़ेगा क्योंकि वह बहुत पैसे वाला है और अपने काम को करने में बहुत शातिर है। वह अपना दांव खेलने के लिए सालों तक इंतज़ार करता है और सही समय आने पर इसे चल देता है। मैंने कहा था कि वह लंदन का सबसे बुरा आदमी है, और मैं तुमसे पूछता हूँ कि एक ऐसा बदमाश जो गर्मजोशी में अपने साथी को नुकसान पहुंचाता है, उसकी तुलना कोई कैसे इस आदमी से कर सकता है, जो पूरा सोच विचार करके और सिर्फ अपनी ख़ुशी और अपने पैसो से भरे बैग को और भरने के लिए लोगो को टार्चर करता है।”

मैंने अपने दोस्त को शायद ही कभी इतने आवेश में बोलते हुए सुना होगा। 
“लेकिन जरूर,” मैंने कहा, “यह आदमी कानून के दायरे में आता होगा?
“तकनीकी रूप से, बेशक, पर वास्तव में नही । किसी औरत को उसे कुछ महीनों लिए जेल भिजवा कर क्या फायदा होगा जब उसके बाद खुद उसकी ही बर्बादी होनी हो? उसके सताये हुए लोग उसके खिलाफ नहीं जाते। अगर उसने कभी किसी मासूम को ब्लैकमेल किया होता तो जरूर हम उसे सजा दिलाते, पर वह शैतान बहुत चालाक है। नहीं, नहीं; हमें उससे निपटने का कोई और रास्ता ढूढ़ना होगा।”   
“और वह यहाँ क्यों आ रहा है?”

“”क्योंकि एक बड़ी क्लाइंट ने अपना दुःखद केस मुझे सौंपा है। वह लेडी एवा ब्रैकवेल है, पिछले सीजन की सबसे खूबसूरत DEBUTANTE. दो हफ़्तों में उसकी शादी डोवेरकोर्ट के नवाब के साथ होनी है। इस शैतान के पास कुछ प्राइवेट लेटर्स हैं -प्राइवेट, वॉटसन, इससे बुरा और कुछ नहीं- ये लेटर् गावँ के एक गरीब नौजवान को लिखे गए थे। ये इस शादी को तोड़ने के लिए काफ़ी है। मिल्वर्टन  इन लेटर्स को नवाब के पास भेज देगा अगर उसे एक बड़ी रकम नहीं दी गयी। मुझे उससे मिलकर अपने क्लाइंट के पक्ष में एक अच्छा सौदा करना है” 

उसी वक्त नीचे सड़क पर खड़खड़ाहट हुई। नीचे झाँकने पर मुझे एक आलीशान गाड़ी दिखी, जिसके दोनों घोड़ों की पीठ लैंप की रौशनी में चमक रही थी। एक दरबान ने दरवाज़ा खोला, और एक छोटा कद काठी का मोटा सा आदमी लंबा फर वाला ओवरकोट पहले नीचे उतरा। और एक मिनट बाद वह हमारे कमरे में था। 

चार्ल्स ऑगस्टस मिल्वर्टन  एक पचास साल का आदमी था, उसका सिर बड़ा, और चेहरा गोल-मटोल था, उसके मुँह पर एक बनावटी मुस्कान थी और वह सोने से बने फ्रेम वाला चश्मा पहने हुए था जिसके पीछे से उसकी दोनों भूरी उत्सुक आंखे चमक रही थी। उसकी दिखावट में मिस्टर पिकविक सी उदारता थी जिसे बस उसकी झूठी मुस्कान और उसकी चुभती हुई बेताब आँखों की तेज चमक ने बिगाड़ दिया था।

पिछली बार हमसे ना मिल पाने का खेद जताते हुए उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, उसकी आवाज़ उसके चेहरे की तरह साफ़ और कोमल थी। होम्स ने उसके बड़े हुए हाथ को नज़रअंदाज़ किया और अपने विस्फोटक चेहरे से उसकी ओर देखा। मिल्वर्टन  ने अपनी मुस्कान और बड़ी कर ली, उसने अपने कंधे उचकाए, अपना ओवरकोट उतारा, और उसे बड़ी सावधानी से एक चेयर के पीछे फोल्ड कर दिया, और फिर बैठ गया।

“ये शख्स?” मेरी ओर इशारा करते हुए उसने कहा। “क्या यहाँ बात करना सही है?”
“डॉ. वॉटसन मेरे दोस्त और पार्टनर हैं।”

“बहुत बढ़िया, मिस्टर होम्स। ये आपके क्लाइंट के लिए जरुरी था इसलिए मैंने पूछा। मामला बहुत नाज़ुक है——”
“डॉ. वॉटसन पहले ही जान चुके हैं।”

“फिर हम काम की बात कर सकते हैं। आपने कहा कि आप लेडी ईवा के लिए काम कर रहें है। क्या उसने आपको मेरी शर्तों को मानने के लिए कहा है?
“आपकी क्या शर्तें हैं?”
“सात हज़ार पाउंड।”
“और कोई तरीका?”

“माय डिअर सर, मेरे लिए इस बारे में बात करना मुश्किल होगा; लेकिन अगर चौदह तारीख़ तक पैसे नहीं दिए तो अठारह तारीख़ को शादी नहीं होगी।” उसकी असहनीय हंसी पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक थी।

होम्स ने थोड़ी देर सोचा।
आखिर में वह बोला, “मुझे ऐसा लग रहा है की तुमने मामले को बहुत आसान समझ लिया है। बेशक, मैं जानता हूँ कि इन खतों में क्या लिखा है। मेरी क्लाइंट वही करेंगी जो मैं उन्हें कहूँगा। मैं उन्हें सलाह दूँगा कि वे अपने होने वाले पति को पूरी कहानी बता दें और उसके उदार होने पर भरोसा रखें।” 
मिल्वर्टन  धीरे से हँसा। 

“तुम नवाब को पूरी तरह से नहीं जानते हो,” उसने कहा। 
होम्स के चेहरे पर आश्चर्य का भाव देखकर मैं समझ गया कि वो उसे जानता है। 
“उन लेटर्स में ऐसा क्या लिखा है?” उसने पूछा। 

“वो जोश से भरे हैं—बहुत जोश से,” मिल्वरटन ने जवाब दिया। “वो लड़की बात करने में बहुत अच्छी है। लेकिन मैं तुम्हें भरोसा दिला सकता हूँ कि डोवेरकोर्ट के नवाब, इस बात की कभी भी सराहना नहीं करेंगे। हालांकि, आप ऐसा नहीं सोचते, हम बाकी बाद के लिए छोड़ देते हैं। वो लेटर पूरी तरह काम के हैं। अगर आपको लगता है कि आपके क्लाइंट के लिए ये सही रहेगा कि ये लेटर नवाब को दिखा दिए जाएँ, तो आप इतने बेवकूफ़ नहीं हैं की उन लेटर्स को वापस लेने के लिए इतनी भारी रकम देंगे।” वह उठा और अपने फर वाले कोट को पकड़ा।

Puri Kahaani Sune….

(hindi) Swamini

(hindi) Swamini

“शिवदास ने भंडारे की चाबी  अपनी बहू रामप्यारी के सामने फेंककर रोते हुए  कहा- “”बहू, आज से  घर की देखभाल तुम्हारे ऊपर है। मेरी खुशी भगवान से देखी  नहीं  गयी , नहीं तो क्या जवान बेटे को ऐसे  छीन लेते।  उसका काम करने वाला तो कोई होना  चाहिए। कोई काम  नहीं करेगा  तो गुजारा नहीं होगा । मेरे ही बुरे कर्मों का फल है ये  और मैं ही अपने ऊपर इसे लूँगा। बिरजू का काम अब में  संभालूँगा। अब घर की देख-भाल करने वाला,जिम्मेदारी उठाने वाला तुम्हारे अलावा दूसरा कौन है? रोओ मत बेटा, भगवान की जो मर्जी  थी, वह तो हो गया; हमारा-तुम्हारा क्या बस चलता  है? मैं जब तक जिन्दा हूँ  तब तक तुम्हे कोई परेशानी नहीं होने दूंगा । तुम किसी बात कि चिंता मत  करो। बिरजू गया, तो मैं अभी बैठा  हूँ।””

रामप्यारी और रामदुलारी दो सगी बहनें थीं। दोनों की शादी मथुरा और बिरजू नाम के सगे भाइयों से हुई थी। दोनों बहनें मायके  की तरह ससुराल में भी प्यार और खुशी से रहने लगीं। शिवदास को पेंशन मिलती थी । वो दिन-भर घर के बाहर इधर उधर की बाते करते रहते ।पूरे  परिवार को  देखकर खुश  होते और ज़्यादातर समय धर्म-चर्चा में लगे रहते; लेकिन अचानक  से बड़ा लड़का बिरजू बीमार पड़ा और आज उसे मरे हुए पंद्रह दिन बीत गये। आज क्रिया-कर्म से फुरसत मिली और शिवदास  फिर से अपने परिवार को सभांलने के लिए तैयार हो गया ।

मन में उसे चाहे कितना ही दु:ख हुआ हो,पर  उसे किसी ने रोते नहीं देखा। आज अपनी बहू को देखकर एक पल  के लिए उसकी आँखें में आँसू आ  गए ; लेकिन उसने मन को संभाला और अपनी बहु को समझाने लगा। शायद  उसने सोचा था कि घर की मालकिन  बनाकर विधवा के कुछ दुःख कम हो जाएंगे , कम-से-कम उसे इतनी  मेहनत  न करनी  पड़ेगी , इसलिए उसने भंडारे की चाबी  बहू के सामने फेंक दी थी।  बहु  के दुःख को जिम्मेदारी देकर कम करना चाहता था।

रामप्यारी ने भरे गले से कहा- “”यह कैसे हो सकता है दादा, कि तुम मेहनत-मजदूरी करो और मैं मालकिन बनकर बैठूँ? काम धंधे में लगी रहूँगी, तो मन बदला रहेगा। बैठे-बैठे तो रोने के सिवा और कुछ न होगा।””

शिवदास ने समझाया- “”बेटा, भगवान की मर्जी के आगे किसी की  नहीं चलती , रोने-धोने  के सिवा और क्या हाथ आयेगा? घर में भी तो बीसों काम हैं। कोई साधु-संत आ जाये , कोई रिश्तेदार ही आ पहुँचे, तो उनके सेवा-सत्कार के लिए किसी को घर पर रहना ही पड़ेगा।””
बहू ने बहुत-जिद की , पर शिवदास ने एक न सुनी। 

शिवदास के बाहर चले जाने पर रामप्यारी ने चाबी  उठायी, तो उसे मन में गौरव और जिम्मेदारी का अहसास  हुआ। कुछ  देर के लिए वो पति का दु:ख भूल गयी । उसकी छोटी बहन और देवर दोनों काम करने गये हुए थे। शिवदास बाहर था। घर बिलकुल खाली था। इस वक्त वह बिना किसी डर के भंडारे को खोल सकती है। उसमें क्या-क्या सामान है, क्या-क्या चीजे  है, यह देखने के लिए उसका मन बेचैन हो रहा था। उस घर में वह कभी न आयी थी। जब कभी किसी को कुछ देना होता या किसी से  कुछ लेना होता, तभी शिवदास आकर इस कोठरी को खोलता था। फिर उसे बंद कर चाबी  अपनी कमर में बांध लेता था।

रामप्यारी कभी-कभी दीवार की छेद से अंदर देखती  थी, पर अंधेरे में कुछ न दिखाई देता। सारे घर के लिए वह कोठरी एक राज थी, जिसके बारे में कई कल्पनाएँ होती रहती थीं। आज रामप्यारी को वह राज  खोलकर देखने का मौका मिल गया। उसने बाहर का दरवाजा  बंद कर दिया, कि कोई उसे भंडार खोलते न देख ले, नहीं तो  सोचेगा, बिना वजह उसने क्यों खोला, तब आकर काँपते हुए हाथों से ताला खोला। उसका दिल धड़क रहा था कि कोई दरवाजा न खटखटाने लगे।

अंदर पैर रखा तो उसे बहुत खुशी हुई , जैसे अपने गहने-कपड़े की आलमारी  खोलने में होती थी । मटकों में गुड़, चीनी, गेहूँ, जौ आदि चीजें रखी हुई थीं। एक किनारे बड़े-बड़े बरतन रखे  थे, जो शादी-ब्याह के मौके पर निकाले जाते थे, या माँगे जाने पर  दिये जाते थे। एक आलमारी  पर मालगुजारी की रसीदें और लेन-देन के कागज  बंधे हुए रखे थे। कोठरी में पैसा भरा था , मानो जैसे लक्ष्मी छुपी बैठी हो। उस पैसे की छाया में रामप्यारी आधे घंटे तक बैठी खुश होती रही। हर पल  उस पर ममता का नशा-सा छाया जा रहा था। जब वह उस कोठरी से निकली, तो उसके मन के विचार बदल गये थे, मानो किसी ने उस पर जादू कर  दिया हो।

उसी समय दरवाजे  पर किसी ने आवाज दी। उसने जल्दी ही  भंडारे का दरवाजा  बंद किया और जाकर  दरवाजा खोल दिया। देखा तो पड़ोसिन झुनिया खड़ी है और एक रूपया उधार माँग रही है।
रामप्यारी ने बड़ा रुखा जवाब दिया – “”अभी तो एक पैसा घर में नहीं है जीजी, क्रिया-कर्म में सब खर्च  हो गया।””

झुनिया चौक  गयी। चौधरी के घर में इस समय एक रूपया भी नहीं है, यह विश्वास करने की बात न थी। जिसके यहाँ सैकड़ों का लेन-देन है, वह सब कुछ क्रिया-कर्म में नहीं खर्च कर सकता। अगर शिवदास ने बहाना किया होता, तो उसे हैरानी  न होता। प्यारी तो अपने सरल स्वभाव के लिए गाँव में मशहूर थी। अक्सर शिवदास से छुपाकर पड़ोसियों को उनकी मर्जी की  चीजे  दे दिया करती थी। अभी कल ही उसने जानकी को एक किलो  दूध दिया था । यहाँ तक कि अपने गहने तक बिना माँगे दे देती थी। कंजूस शिवदास के घर में ऐसी सीधी  बहू का आना गाँव वाले उसकी अच्छी किस्मत समझते थे।

झुनिया ने हैरान होकर कहा- “”ऐसा न कहो जीजी, बड़ी मुसीबत  में पड़कर आयी हूँ, नहीं तो तुम जानती हो, मेरी आदत ऐसी नहीं है। बाकी का एक रूपया देना है। लेनदार दरवाजे  पर खड़ा बुरा भला  कह  रहा है। एक रूपया दे दो, तो किसी तरह यह मुसीबत  टले। मैं आज से  आठवें दिन आकर दे जाऊँगी। गाँव में और कौन घर है, जहाँ माँगने जाऊँ?””

Puri Kahaani Sune…

(hindi) Shikar

(hindi) Shikar

“फटे कपड़ो  वाली मुनिया ने रानी वसुधा के सुन्दर चेहरे की ओर सम्मान भरी आँखो से देखकर राजकुमार को गोद में उठाते हुए कहा, “”हम गरीबों का इस तरह कैसे गुज़ारा हो सकता है महारानी ! मेरी तो अपने आदमी से एक दिन न बने , मैं उसे घर में बैठने  न दूँ। ऐसी-ऐसी गालियाँ सुनाऊँ कि वो परेशान हो  जाय।””

रानी वसुधा ने समझदारी  से कहा, “”क्यों, वह कहेगा नहीं, तू मेरे बीच में बोलने वाली कौन है ? मेरी जो मर्जी होगी वह करूँगा। तू अपना रोटी-कपड़ा मुझसे लिया कर। तुझे मेरी दूसरी बातों से क्या मतलब ? मैं तेरा नौकर नहीं हूँ।””

मुनिया तीन दिन पहले ही यहाँ लड़कों को खिलाने के लिए आयी  थी। पहले दो-चार घरों में चौका-बरतन कर चुकी थी; पर रानियों से तमीज के साथ बातें करना अभी न सीख पाई थी। ये सुनकर उसे गुस्सा आया । वो कड़वे शब्दों में बोली,”” ज़िस दिन ऐसी बातें मुँह से निकालेगा, मूँछें उखाड़ लूँगी सरकार ! वह मेरा नौकर नहीं है, तो क्या मैं उसकी नौकरानी हूँ ? अगर वह मेरा नौकर है, तो मैं उसकी नौकरानी हूँ। मैं खुद नहीं खाती, पर उसे खिला देती हूँ; क्योंकि वह आदमी है। उसे बहुत बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

मैं चाहे फटे पहनूँ; पर उसे फटे-पुराने नहीं पहनने देती। जब मैं उसके लिए इतना करती हूँ, तो मतलब ही नहीं कि वह मुझे आँख दिखाये। अपने घर को आदमी इसलिए तो ढकता  है, कि उससे बारिश में बचाव हो। अगर यह डर लगा रहे, कि घर न जाने कब गिर पड़ेगा, तो ऐसे घर में कौन रहेगा। उससे तो गन्ने की छाँव ही कहीं अच्छी।””
“”कल न जाने कहाँ बैठा गाता-बजाता रहा। दस बजे रात को घर आया। मैं रात-भर उससे बोली, ही नहीं।  पैर पड़ने लगा, मनाने लगा , तब मुझे दया आ गयी ! यही मुझमें एक बुराई है। मुझसे उसकी रोनी सूरत नहीं देखी जाती। इसी से वह कभी-कभी गलती कर जाता है; पर अब मैं पक्की हो गई हूँ। फिर किसी दिन झगड़ा किया, तो या वही रहेगा, या मैं ही रहूँगी। क्यों किसी की डांट झेलूँ सरकार ? जो बैठकर खाय, वह  ! डांट झेले यहाँ तो बराबर की कमाई करती हूँ। “”

वसुधा ने उसी गम्भीर भाव से फिर पूछा “अगर वह तुझे बैठाकर खिलाता तब उसकी डांट झेलती?””
 मुनिया जैसे लड़ने पर आ  गयी बोली, “”बैठाकर कोई क्या खिलायेगा सरकार ? वो  बाहर काम करता है, तो हम भी घर में काम करती हैं, या  घर के काम में कुछ लगता ही नहीं ? बाहर के काम से तो रात को छुट्टी मिल जाती है। घर के काम से तो रात को भी छुट्टी नहीं मिलती। आदमी  यह चाहे कि मुझे घर में बिठाकर वो घूमे, तो मुझसे तो न सहा जाय “” यह कहती हुई मुनिया राजकुमार को लिये हुए बाहर चली गयी।
 
वसुधा ने थकी हुई, रोती हुई आँखो से खिड़की की ओर देखा। बाहर हरा-भरा बाग था, जिसके रंग-बिरंगे फूल यहाँ से साफ नजर आ रहे थे और पीछे एक बड़ा मंदिर आसमान तक ऊँचा दिखाई देता था। औरते सज धज कर पूजन करने आ रही थीं। मन्दिर के दाएं तरफ तालाब में कमल खिले थे जो कार्तिक कि ठंड में सूरज की गर्मी में मुस्कुरा रहे थे। पर यह सब वसुधा को कोई ख़ुशी न दे सके। उसे लगा ये सब उस उसका मजाक उड़ा रहे है। उसी तालाब के किनारे केवट की टूटी फूटी झोपड़ी  किसी गरीब बुढ़िया कि तरह रो रही थी ।

वसुधा की आँखें भर आयी। फूलो और बगीचे के बीच में खड़ी वो सूनी झोपड़ी   उसके ऐश्वर्य और ऐशो आराम से घिरे हुए मन की जीती जागती तस्वीर थी। उसके जी में आया, जाकर झोपड़े के गले लिपट जाऊँ और खूब रोऊँ ! वसुधा को इस घर में आये पाँच साल हो गये थे । पहले उसे अपनी किस्मत पर ख़ुशी हुई । माता-पिता के छोटे-से कच्चे घर को छोड़कर, वह एक बड़े घर में आयी थी, जहाँ बहुत दौलत और सुविधाएं थी । उस समय पैसा  ही उसकी आँखो में सब कुछ था । पति का प्यार छोटी सी बात थी , पर उसका लालची मन पैसे तक ही टिका न रह सका, पति के प्यार के लिए हाथ फैलाने लगा।

कुछ दिनों में वो माँ बन गयी तो लगा उसे सब कुछ मिल गया है , पर थोड़े ही दिनों में यह वहम भी दूर हो गया । कुँवर गजराज सिंह सुन्दर , दयालु, ताकतवर, पढ़े लिखे, हंसी मजाक करने वाले और प्यार का नाटक भी करना जानते थे; उनके जीवन में प्यार नाम की चीज़ नहीं थी।वसुधा की जवानी और सुंदरता सिर्फ़ दिल बहलाने का सामान थी । घुड़ दौड़ और शिकार, सट्टे और मकार जैसे खेलो में प्यार दबकर पीला और बेजान हो  गया था। और प्यार के बिना  वुसधा अब भाग्य को रोया करती थी। दो बेटे  पाकर भी वह खुश न थी।

कुंवर साहब एक महीने से ज्यादा हुआ, शिकार खेलने गये और अभी तक वापिस नहीं आये और ऐसा, पहली बार नहीं हुआ था। हाँ, अब उसका समय बढ़ गया था। पहले वह एक हफ्ते में वापिस आते थे; फिर दो हफ्ते का नम्बर चला और अब कई बार से एक-एक महीने की खबर लेने लगे। साल में तीन-तीन महीने शिकार में निकल जाते थे। शिकार से आते, तो घुड़ दौड़ शुरू हो जाता। कभी मेरठ, कभी पूना, कभी बम्बई, कभी कलकत्ता। घर पर ही रहते, तो अक्सर अमीर बिगड़ैल  के साथ गप्पें लड़ाया करते। पति के यह रंग-ढंग देखकर वसुधा मन-ही-मन चिढ़ती  और बीमार पड़ती जाती थी। कुछ दिनों से हल्का-हल्का बुखार भी रहने लगा था।

Puri Kahaani Sune….

(hindi) Shankhnad

(hindi) Shankhnad

“भानु चौधरी अपने गाँव के मुखिया थे। गाँव में उनका बड़ा मान था। दारोगा जी उन्हें जमीन पर दरी बिछाए बिना बैठने नहीं देते थे । मुखिया साहब का गाँव में ऐसा प्रभाव था कि उनकी मर्ज़ी के बिना गाँव में एक पत्ता भी नहीं  हिल सकता था। कोई घटना, चाहे वह सास-बहू का झगड़ा हो या जमीन का विवाद, चौधरी साहब का पूरे गाँव में राज था, वह तुरंत घटना की जगह पर पहुँच जाते, जाँच – पड़ताल होने लगती, गवाह और सबूत के अलावा किसी केस को सफलता से चलाने में जिन बातों की जरूरत होती है, उन सब पर विचार होता और चौधरी जी के दरबार से फैसला हो जाता।

 

किसी को अदालत जाने की जरूरत नहीं  पड़ती थी। हाँ, इसके लिए चौधरी साहब कुछ फीस जरूर लेते थे। अगर किसी मौके पर फीस मिलने में दिक्क़त के कारण उन्हें धीरज से काम लेना पड़ता तो गाँव में आफत मच जाती; क्योंकि उनका धीरज और दारोगा जी का गुस्सा एक जैसा था। कुल मिलकर बात यह है कि चौधरी से उनके दोस्त-दुश्मन सभी सावधान रहते थे।

चौधरी जी के तीन लड़के थे। बड़े लड़के बितान एक पढ़े-लिखे इंसान थे। पोस्टमैन के रजिस्टर पर साइन कर लेते थे। बड़े अनुभवी, तेज और मेहनती थे कुर्ते की जगह शर्ट  पहनते, कभी-कभी सिगरेट भी पीते, जिससे उनका रौब बढ़ता था। हालांकि उनकी ये बुरी आदतें बूढ़े चौधरी को नापसंद थी, पर बेचारे मजबूर थे; क्योंकि अदालत और कानून के मामले बितान के हाथों में थे। वह कानून का जानकार था। कानून की धाराएं उसकी जबान पर रखी रहती थीं। झूठे गवाह बनाने में वह पूरा उस्ताद था। दूसरे लड़के शान चौधरी Agriculture Department के अधिकारी थे।

मंद बु़द्धि थे; लेकिन शरीर से बड़े मेहनती थे। जहाँ घास ना जमती हो, वहाँ केसर जमा दें। तीसरे लड़के का नाम गुमान था। वह बड़ा कामचोर, साथ ही शरारती भी था। मुहर्रम में ढोल इतने जोरों से बजाता कि कान के पर्दे फट जाते। मछली फँसाने का बड़ा शौकीन था। बड़ा रँगीला जवान था। ढपली बजा-बजाकर जब वह मीठी आवाज़ से गीत गाता, तो रंग जम जाता था । उसे दंगल का ऐसा शौक था कि दूर दूर तक कुश्ती लड़ने जाता; पर घरवाले कुछ ऐसे कठोर थे कि उसके शौक से जरा भी हमदर्दी नहीं रखते थे। पिता और भाइयों ने तो उसे नाकारा समझ रखा था। डाँट -धमकी, शिक्षा और उपदेश, प्यार और विनम्रता, किसी का उस पर कुछ भी असर नहीं हुआ। हाँ, भाभियाँ अभी तक उसकी ओर से निराश नहीं हुई थीं। वे अभी तक उसे कड़वी दवाइयाँ पिलाये जाती थीं; पर आलस वह रोग है जिसका रोगी कभी नहीं  सँभलता।

कभी-कभार ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब  गुमान को भाभियों के ताने ना सुनने पड़ते हों। ये कड़वे शब्द कभी-कभी उसके कठोर दिल में चुभ जाते; लेकिन  यह घाव रात भर से ज़्यादा नहीं रहता। सुबह होते ही थकान के साथ ही यह पीड़ा भी शांत हो जाती। सुबह हुई, उसने हाथ-मुँह धोया, बंशी उठायी और तालाब की ओर चल दिया। भाभियाँ फूल बरसाती; बूढ़े चौधरी अलग- अलग तरीके से कोशिश करते रहते और भाई लोग तीखी नजरों से देखा करते, पर वह अपनी ही धुन में उन लोगों के बीच से इस तरह अकड़ता हुआ चला जाता, जैसे कोई मस्त हाथी कुत्तों के बीच से निकल जाता है। उसे सही रास्ते पर लाने के लिए क्या-क्या उपाय नहीं किये गये। बाप समझाता-“बेटा ऐसी राह चलो जिसमें तुम्हें भी पैसे मिलें और घर-परिवार भी चल सके। भाइयों के भरोसे कब तक रहोगे? मैं बूढ़ा हो चुका हूँ -आज चल बसूं या कल।

फिर तुम्हारा गुजारा  कैसे होगा? भाई बात भी नहीं पूछेंगे; भाभियों का रंग देख ही रहे हो। तुम्हारे भी बच्चे हैं, उनका भार कैसे सँभालोगे? खेती में मन नहीं लगता, कहो तो पुलिस कांस्टेबल के लिए भर्ती करा दूँ?”  गुमान खड़ा-खड़ा यह सब सुनता रहता, लेकिन पत्थर का देवता था, कभी ना मानता। इन साहब के अत्याचार की सजा उनकी बेचारी पत्नी को झेलनी पड़ती। घर के जितने मेहनती काम होते, वे उसी को करने पड़ते। गोबर के उपले बनाती, कुएँ से पानी लाती, आटा पीसती और इस पर भी जेठानियाँ सीधे मुँह बात ना करतीं थीं , ऊपर से ताने सुनाया करती।

एक बार जब वह पति से कई दिन रूठी रही, तो गुमान कुछ नर्म हुए। बाप से जा कर बोले-“मेरे लिए कोई दुकान खोल दीजिए”। चौधरी ने भगवान को धन्यवाद दिया और ख़ुशी से झूम उठे। कई सौ रुपये लगा कर कपड़े की दुकान  खुलवा दी। गुमान की किस्मत जागी। तनजेब के चुन्नटदार कुर्ते बनवाये, मलमल की पगड़ी हल्के हरे रंग में रँगवाया। सामान बिके या ना बिके, उसे फ़ायदा ही होना था! दुकान खुली हुई है, दस-पाँच दोस्त जमे हुए हैं, चरस की दम और गाने की धुन बज रही हैं-
चल झटपट री, जमुना-तट री, खड़ो नटखट री।

Puri Kahaani Sune….

(hindi) Saut

(hindi) Saut

“जब रजिया के दो-तीन बच्चे होकर मर गये और उम्र ढल चली, तो रामू का प्रेम उससे कुछ कम होने लगा और दूसरी शादी की धुन सवार हुई। आये दिन रजिया से बकझक होने लगी। रामू एक-न-एक बहाना खोजकर रजिया पर बिगड़ता और उसे मारता और अन्त में वह नई पत्नी ले ही आया। इसका नाम था दासी। चम्पई रंग था, बड़ी-बडी आंखें, जवानी की उम्र। पीली, कुंशागी रजिया भला इस जवान लड़की के सामने क्या जांचती! फिर भी वह जाते हुए मालिकपन को, जितने दिन हो सके अपने अधिकार में रखना चाहती थी। घर के हिलते हुए छप्पर को सम्हालने की कोशिश कर रही थी। इस घर को उसने मर-मरकर बनाया है। उसे सहज ही में नहीं छोड़ सकती थी । वह इतनी नासमझ नहीं है कि घर छोड़कर चली जाय और दासी राज करे।

एक दिन रजिया ने रामू से कहा—“मेरे पास साड़ी नहीं है, जाकर ला दो”।
रामु उसके एक दिन पहले दासी के लिए अच्छी-सी चुंदरी लाया था। रजिया की मांग सुनकर बोला—“मेरे पास अभी रूपया नहीं है”।
रजिया को साड़ी की उतनी चाह न थी जितनी रामू और दसिया की ख़ुशी में बाधा डालने की। बोली—“रूपये नहीं थे, तो कल अपनी चहेती के लिए चुंदरी क्यों लाये? चुंदरी के बदले उसी दाम में दो साड़ियां लाते, तो एक मेरे काम न आ जाती?”

रामू ने कहा—“मेरी इच्छा, जो चाहूंगा, करूंगा, तू बोलने वाली कौन है? अभी उसके खाने-खेलने के दिन है। तू चाहती है, उसे अभी से घर गृहस्थी की चिन्ता में डाल दूं। यह मुझसे न होगा। तुझे ओढने-पहनने की इच्छा है तो काम कर, भगवान ने क्या हाथ-पैर नहीं दिये। पहले तो देर रात उठकर काम धंघे में लग जाती थी। अब उसकी जलन में दिन तक पड़ी रहती है। तो रूपये क्या आकाश से गिरेंगे? मैं तेरे लिए अपनी जान थोड़े ही दे दूंगा”।

रजिया ने कहा—“तो क्या मैं उसकी नौकरानी हूं कि वह रानी की तरह पड़ी रहे और मैं घर का सारा काम करती रहूं? इतने दिनों छाती फाड़कर काम किया, उसका यह फल मिला, तो अब मेरी बला काम करने आती है”।

‘मैं जैसे रखूंगा, वैसे ही तुझे रहना पड़ेगा।’
‘मेरी इच्छा होगी रहूंगी, नहीं तो अलग हो जाऊंगी।’
‘जो तेरी इचछा हो, कर, मेरा गला छोड़।’
‘अच्छी बात है। आज से तेरा गला छोड़ती हूं। समझ लूंगी विधवा हो गई।’

रामु दिल में इतना तो समझता था कि यह गृहस्थी रजिया की बनाई हुई हैं, चाहे उसके रूप में उसके विलास के लिए आकर्षण न हो। मुमकिन था, कुछ देर के बाद वह जाकर रजिया को मना लेता, पर दासी भी कूटनीति में माहिर थी। उसने गम्र लोहे पर चोट जमाना शूरू कीं। बोली—“आज देवी जी किस बात पर बिगड़ रही थी?”

रामु ने उदास मन से कहा—“तेरी चुंदरी के पीछे रजिया महाभारत मचाये हुए है। अब कहती है, अलग रहूंगी। मैंने कह दिया, तेरी जो इच्छा हो कर”।
दसिया ने ऑखें मटकाकर कहा—“यह सब नखरे है कि तुम जाकर हाथ-पांव जोड़ो, मनाओ  और कुछ नहीं। तुम चुपचाप बैठे रहो। दो-चार दिन में अपने आप ही गरमी उतर जायेगी। तुम कुछ बोलना नहीं, उसका मिजाज और आसमान पर चढ़ जायगा”।
रामू ने गम्भीर भाव से कहा—“दासी, तुम जानती हो, वह कितनी घमंडी है। वह मुंह से जो बात कहती है, उसे करके छोड़ती है”।

रजिया को भी रामू से ऐसी नाशुक्री की आशा न थी। वह जब पहले की-सी सुन्दर नहीं, इसलिए रामू को अब उससे प्रेम नहीं है। आदमी के चरित्र में यह कोई असाधारण बात न थी, लेकिन रामू उससे अलग रहेगा, इसका उसे विश्वास न हो रहा था। यह घर उसी ने पैसा-पैसा जोड़ेकर बनवाया था । गृहस्थी भी उसी की जोड़ी हुई है। अनाज का लेन-देन उसी ने शुरू किया। इस घर में आकर उसने कौन-कौन सी तकलीफ़ नहीं झेली, इसीलिए ना कि उम्र के कारण थक जाने पर एक टुकड़ा चैन से खायगी और पड़ी रहेगी, और आज वह इतनी बेरहमी से दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दी गई! रामू ने इतना भी नहीं कहा—“तू अलग नहीं रहने पायेगी। मैं या खुद मर जाऊंगा या तुझे मार डालूंगा, पर तुझे अलग न होने दूंगा।

तुझसे मेरी शादी हुई है, कोई हंसी-मज़ाक नहीं है”। तो जब रामू को उसकी परवाह नहीं है, तो वह रामू की  क्यों परवाह करे। क्या सभी औरतों के पति बैठे होते हैं। सभी के मां-बाप, बेटे-पोते होते हैं। आज उसके लड़के जिंदा होते, तो मजाल थी कि यह नई पत्नी लाते, और मेरी यह दुर्गति करते? इस बेरहम को मेरे ऊपर इतनी भी दया न आई?
औरत के मन की मजबूरी इस अत्याचार से विद्रोह करने लगी। वही आग जो मोटी लकड़ी को छू भी नहीं कर सकती, फूस को जलाकर भस्म कर देती है।

Puri Kahaani Sune….